नहूम 1:10 बाइबल पद की व्याख्या
नहूम 1:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि चाहे वे काँटों से उलझे हुए हों, और मदिरा के नशे में चूर भी हों, तो भी वे सूखी खूँटी की समान भस्म किए जाएँगे।
नहूम 1:10 पद-दर-पद बाइबल टीका
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नहूम 1:10 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मीका 7:4 (HINIRV) »
उनमें से जो सबसे उत्तम है, वह कटीली झाड़ी के समान दुःखदाई है, जो सबसे सीधा है, वह काँटेवाले बाड़े से भी बुरा है। तेरे पहरुओं का कहा हुआ दिन, अर्थात् तेरे दण्ड का दिन आ गया है। अब वे शीघ्र भ्रमित हो जाएँगे।

यशायाह 5:24 (HINIRV) »
इस कारण जैसे अग्नि की लौ से खूँटी भस्म होती है और सूखी घास जलकर बैठ जाती है, वैसे ही उनकी जड़ सड़ जाएगी और उनके फूल धूल होकर उड़ जाएँगे; क्योंकि उन्होंने सेनाओं के यहोवा की व्यवस्था को निकम्मी जाना, और इस्राएल के पवित्र के वचन को तुच्छ जाना है।

यशायाह 9:18 (HINIRV) »
क्योंकि दुष्टता आग के समान धधकती है, वह ऊँटकटारों और काँटों को भस्म करती है, वरन् वह घने वन की झाड़ियों में आग लगाती है और वह धुएँ में चकरा-चकराकर ऊपर की ओर उठती है।
नहूम 1:10 पर टिप्पणी—काँटों से उलझे हुए दीपक, मदिरे के नशे में चूर भी बन सकने वाले प्रभाव से भी उजाड़ किया जाएगा
मुख्य interpretive बिंदु: यह पद नहूम पुस्तक के आरम्भिक अध्याय में दया और न्याय के संतुलन को दर्शाता है। परमेश्वर के प्रकोप के समय भी वे जो काँटों से अटका हुआ प्रतीत होते हैं, या जो मदिरा के नशे में डूबे रहते हैं, उन्हें भी एक कठोर वास्तविकता का सामना करना पड़ेगा: प्रभु का न्याय न केवल बाहरी शक्तियों पर, बल्कि अविश्वास, अत्याचार और दुष्कर्म की आंतरिक स्थितियों पर भी—खाली दिखती निराशा नहीं, बल्कि निश्चित और दृढ़ परिणाम है। इस वाक्य में निष्कर्ष स्पष्ट है: मनुष्य चाहे कितने भी भ्रम में क्यों न हों, अंततः प्रभु के निर्णय से मुक्त नहीं हो पाते।
पाठ-परिप्रेक्ष्य (साहित्यिक संदर्भ)
नहूम की पुस्तक नोह के समकालीन ऐतिहासिक संदर्भों में ईश्वर कीर्ति के क्षरण और संसर्ग के विरुद्ध एक न्यायपूर्ण जवाब है। इस पद में “काँटों से उलझे हुए” और “मदार के नशे में चूर” व्यक्ति-स्थिति का सामंजस्य है: भौतिक असफलता तथा आत्मिक अवज्ञा एक साथ दिखती है, पर परमेश्वर की न्याय-गति इन दोनों को काटती है और उन्हें “सूखी खूँटी की समान” निष्प्रभ बनाती है—यानी टिके रहने की आशा समाप्त। यह चेतावनी भी है कि एक समय ऐसा आ सकता है जब दुष्कर्मों के कारण स्थितियाँ ठहर जाती हैं और दया भी यथार्थ बनकर सामने आती है।
धर्मशास्त्रीय महत्त्व
इस वाक्य में परमेश्वर की निर्भयता और पाप के विरुद्ध कठोरता एक साथ मिलती है। यह बोध देता है कि दुष्कर्म के परिणाम न केवल बाहरी समाज पर पड़ते हैं, बल्कि व्यक्ति के भीतर की स्थिति—नशे, भ्रम, और स्थायित्व की कमी—निष्क्रिय नहीं रहते। बाँधना या पकड़ना नहीं, बल्कि उद्धार भी उसी समय संभव है जब सच सामने आता है। साथ ही यह भी कि प्रभु की दयालुता के साथ न्याय का संतुलन बना रहता है; जहाँ दया है, वहाँ भी पाप के परिणाम मिटते नहीं।
पवित्रशास्त्र से संबंध (cross-references)
आंतरिक चिंतन के लिए प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
नहूम 1:10 हमें यह स्मरण कराता है कि चाहे स्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो—काँटों से भरे रास्ते पर कोई स्थायी टिक नहीं पाता, चाहे व्यक्ति मदिरा के नशे में हो या शारीरिक कष्ट से, प्रभु का निर्णय अविचल है। इससे प्रेरणा मिलती है कि परमेश्वर के न्याय के साथ कृपा भी सक्रिय रहती है, पर मानव-स्वार्थ और पाप के ढांचे टूटते हैं तब ही सही सच्चे उद्धार की राह खुलती है।
सूत्र उद्धरण (महत्वपूर्ण कहे गए अंश)
नहीं प्रकाशित पूरे पाठ; केवल आवश्यक उल्लेख:
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke जैसे प्रकाशकों के भीतर से सीधे उद्धरण उपलब्ध हों तो वे नीचे उल्लेखित रूप में शामिल होंगे। वर्तमान प्रस्तुति में कोई पूर्ण-वाक्य उद्धरण नहीं दिया गया है; इसकी आवश्यकता होने पर भविष्य के संस्करण में जोड़ा जाएगा।