Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66Verse
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मुख्य(interpretive point)
यशायाह 5:24 का यह श्लोक गहराई से उन लोगों की स्थिति दिखाता है जो परमेश्वर की व्यवस्था और पवित्र वचनों को उपेक्षित करते हैं। जैसे आग सूखी घास और खूँटी को भस्म कर देती है, वैसे ही उनके जड़-मूल और प्रभाव बंदी हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने यहोवा की सेनाओं की व्यवस्था को तुच्छ समझ लिया है। नतीजा यह है कि तबाही उनके जीवन के हर हिस्से में उतर आती है; उनका आत्मीय जीवन फीका पड़ जाता है और उनके धार्मिक आचरण में नैतिक ढीलापन पनपता है।
पाठ के साहित्यिक प्रसंग ( literary context )
यह श्लोक इशायाह के बयानों का एक भाग है जो इशायाह के समय के सत्ता-समीकरण और ईश्वर के न्याय के संदेश को संदर्भित करता है। मीठे-मीठे बयानों के पीछे एक मजबूत चेतावनी है—व्यक्ति या समाज यदि ईश्वर के नियमों से पलट जाए, तो उसकी पहचान और भविष्य भी खतरे में पड़ जाते हैं। “आग की लौ” और “सूखी घास” जैसी रूपकें प्रकृति के साथ-साथ नैतिक परिणामों को भी व्यक्त करती हैं: बिना साधना, विश्वास और उत्साह के जीवन में आत्मिक जड़हीनता आ जाती है।
theological significance (आध्यात्मिक महत्व)
यह पद यह दर्शाता है कि परमेश्वर की व्यवस्था कोई खाली சட்ட नहीं है; उसकी क्रिया और न्याय जीवन की स्थिरता से जुड़ी है। राजनीतिक या सामाजिक शुद्धता के बजाय, यह आह्वान है कि धार्मिक सद्गुणों में निरंतरता हो—यही वह क्षेत्र है जहाँ लोगों को सचेत रहना चाहिए। ईश्वर के पवित्र वचनों को तुच्छ समझना, अंततः एक आत्मिक उखड़ाव का कारण बनता है, और परिणामस्वरूप सामाजिक-नैतिक गिरावट।
cross-references (अंतःकलन-संदर्श)
प्रश्न-चर्चा (reflection questions)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह श्लोक एक चेतावनी है: ईश्वर की व्यवस्था को गम्भीरता से लेना आवश्यक है, वरना लोग स्वयं अपनी जड़ें खो देते हैं और परिणामस्वरूप आंतरिक और सामाजिक संरचना ढह जाती है। प्रतिबद्धता, पश्चाताप और हृदय के परिवर्तन के बिना धर्म केवल ध्वनि बन जाती है; परन्तु यदि हम देव की पवित्रता को अपना केंद्र बनाते हैं, तब जीवन की अग्नि में भी अँधेरा नहीं बैठेगा।
महत्वपूर्ण उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke) – यदि उपलब्ध:
उद्धरणों का उल्लेख निम्न स्वरूप है: “-यहां दिया गया छोटा उद्धरण”।
अनुदेशात्मक उद्धरण (यदि उपलब्ध)
यह भाग केवल यदि स्रोत उपलब्ध हों, इन्हें संक्षेप में सम्मिलित किया जाएगा:
Matthew Henry से: “...उद्धरण का संक्षिप्त अंश...”
Albert Barnes से: “...उद्धरण का संक्षिप्त अंश...”
Adam Clarke से: “...उद्धरण का संक्षिप्त अंश...”