Old Testament
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यशायाह 5:16 पर टिप्पणी
यह पद इब्रानी सन्निवेश के भीतर एक व्यापक दायरे में न्याय और पवित्रता की महत्ता को दर्शाता है। यशायाह ने इस्तीफे के साथ समाज के भ्रष्टाचार को उजागर किया और परमेश्वर के नीचे सही ढंग से न्याय करने की महिमा को प्रतिष्ठित किया। यह वचनों का केंद्र पवित्रता और न्याय की एक उत्कट ध्वनि है, जिसे भविष्य की सन्तानों के लिए भी अहितकर बताने वाले अतिरेकी समाज के विरुद्ध परमेश्वर की शुद्धता और धर्मीता की स्थिरता के रूप में पढ़ा जाता है।
कथन का पृष्ठभूमि
यशायाह 5 अध्याय एक सूचिका-गीत के रूप में है जिसमें ईश्वर की बग़ावत, पृथक-संकेत और न्याय के संदेश का नाटक है। 5:16 में परमेश्वर का चरित्र दो आयामों में दृश्यमान होता है— न्याय के कारण महान ठहरना और धर्मी होने के कारण पवित्र ठहरना। यह बताता है कि परमेश्वर का महिमान्वित होना न केवल दयालुता में है, बल्कि सही निर्णयों में भी है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
पद कहता है कि सेनाओं का यहोवा न्याय करने के कारण महान ठहरता है, और पवित्र परमेश्वर धर्मी होने के कारण पवित्र ठहरता है। यहाँ दो विन्यास एक मजबूत संतुलन बनाते हैं: न्याय से परमेश्वर सत्ता में आते हैं, और धर्मी प्रमाण से उसकी पवित्रता प्रकट होती है। यह हमे सिखाता है कि परमेश्वर की वीरता और पवित्रता एक साथ चलते हैं—न्याय से पथप्रदर्शित होकर वह दया का भी निर्वहन करते हैं।
पूर्ववर्ती टिप्पणीकारों के संकेत
प्राचीन टिप्पणीकारों ने इसे परमेश्वर की दोहरी गरिमा के रूप में देखा है: न्याय के कारण उसकी डिग्री और पवित्रता के कारण उसकी पूजनीयता। मॉथ्यू Henry, अलेक्टर बार्न्स और एडम क्लार्क ने इसे मानव जाति के लिए एक चेतावनी और परमेश्वर के एकत्व की पुष्टि के रूप में व्याख्यायित किया है—यही कारण है कि वह संसार के अधर्म पर न्याय रखते हैं और अपनी पवित्रता से उसे पूर्ण करते हैं।
उद्धृत टिप्पणीकारों के संकेत (संक्षेप)
महत्वपूर्ण अंश: Henry, Barnes, Clarke से अन्यतम नहीं, परंतु वे इस प्रकार के तर्क देते हैं कि परमेश्वर की महिमा उसकी न्याय-सत्ता और पवित्रता दोनों से अभिव्यक्त होती है। यदि आप उनके छोटे उद्धरणों को देखें, वे अक्सर यह इंगित करते हैं कि परमेश्वर का न्यायधर्मी व्यवहार संसार के लिए सुरक्षा और पवित्रता के लिए प्रेरणा है।
क्रॉस-रेफरेंस और उनका संक्षेप
1) निर्गमन 34:6-7 जैसी स्थिरता: परमेश्वर अपने नाम को धैर्य और दया के साथ प्रस्तुत करते हैं, परन्तु न्याय से नहीं तिरोहित होते। यह समझाता है कि पवित्रता और न्याय एक दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं।
2) पवित्र प्रेरितियों के गीत 57:2: परमेश्वर का निश्चय और न्याय के साथ रहने का आश्वासन देता है, जिससे भक्तों को विश्वास की स्थिरता मिलती है।
3) रोम 3:26: धर्मी हो जाने का प्रमाण परमेश्वर की कृपा के माध्यम से—यही न्याय और पवित्रता की एकता का गहरा संदेश है।
उपयुक्त अनुप्रयोग
संक्षेप सार
यशायाह 5:16 परमेश्वर की दोहरी गरिमा को उजागर करता है—न्याय से उसका सामर्थ्य और पवित्रता से उसकी प्रतिष्ठा। यह हमें यह सिखाता है कि सत्य-न्याय और पवित्रता एक ही उद्देश्य की दो धाराएं हैं: वह संसार के लिए न्यायपूर्ण शासक है और अपने लोगों के लिए पवित्रता के लिए प्रेरित।