यशायाह 5:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इस कारण यहोवा का क्रोध अपनी प्रजा पर भड़का है, और उसने उनके विरुद्ध हाथ बढ़ाकर उनको मारा है, और पहाड़ काँप उठे; और लोगों की लोथें सड़कों के बीच कूड़ा सी पड़ी हैं। इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।

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यशायाह 5:25 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 5:25 का अर्थ और संदर्भ

यह पद यहोवा के क्रोध की गहराई को दर्शाता है: उसकी प्रजा ने पथभ्रष्ट होकर तोहमतों के बजाय दुष्टतापूर्ण व्यवहार अपनाया, इसलिए ईश्वर का क्रोध उभरकर दिखा और जो लोग परमेश्वर के मार्ग पर चलने चाहिए थे, उनके विरुद्ध उसकी शक्ति अनुभव की गई। पहाड़ कांप उठे, लोगों की लाशें सड़कों पर पड़ीं—यह हमारी चेतावनी है कि पाप से होने वाला दंड कितना कठोर हो सकता है। परन्तु यहाँ भी संकेत है कि उसका हाथ अभी तक बढ़ा हुआ है; यह संकेत देता है कि ईश्वर धैर्यपूर्वक चेतावनी दे रहे हैं, बल्कि पुनः एक आह्वान है कि पाप से हटकर उद्धार और शांति की दिशा को अपनाया जाए।

संक्षिप्त पृष्ठभूमि

यशायाह की पुस्तक में यहोवा की न्याय-संबन्धी बुलाई गई चेतावनियाँ शासन के असंतोष, सामाजिक अन्याय और आध्यात्मिक निर्भरता के अभाव पर केंद्रित हैं। इस अध्याय में प्रभु के लोग, जो धर्म के नाम पर अपने कर्तव्य से दूर हट गए, उनके प्रति क्रोध स्पष्ट है। यह न केवल विजय-युद्ध का चित्रण है, बल्कि दण्ड और न्याय की सख्ती का संकेत भी है, ताकि ईश्वर के लोग पवित्रता की ओर लौटें।

व्याख्यात्मक निष्कर्ष

  • पाप के कारण क्रोध: समान्य जीवन-शैली में भ्र्ष्टाचार, अन्याय और निष्क्रियता पाप के समान है और इसलिए परमेश्वर के क्रोध को जन्म देती है।
  • कृत्य के परिणाम: पहाड़ काँपना और लोथों का मिलना — समाज के ढहने और मानवीय मूल्य खो जाने की तस्वीर है, जो दंड के दृढ़ प्रमाण के रूप में प्रस्तुत होती है।
  • अभी भी अवसर की संभावना: “हाथ बढ़ा हुआ है” का संकेत दर्शाता है कि ईश्वर तत्वतः दयालु और उद्धार की चाह रखने वाले के लिए रास्ता खोलते रहते हैं, यदि वे पलट कर तौबा करें।

क्रिस-सम्बन्धी विचार (cross-references) और संक्षिप्त व्याख्या

1) अध्याय 5 में उठता यह संकट आसन्न दंड का पूर्व-चेतावन है; ईश्वर की अनुयायियों के लिए सामना करने योग्य आचरण और नैतिकता की कसौटी बताता है।

2) यशायाह 1:25-26 में कहा गया है कि प्रभु जड़ से पाप को हटाकर न्याय-राज्य स्थापित करेंगे; यह संदर्भ बताता है कि दंड के साथ पुनः प्रतिष्ठा और पुनर्स्थापना की योजना भी है।

3) निर्गमन 20: Human-धार्मिक आचार-व्यवहार के अनुरूप थे, परन्तु सामाजिक अन्याय और बुरे मार्गों के कारण चेतावनियाँ दी जाती हैं; यह पंक्ति दिखाती है कि परमेश्वर के नियमों के उल्लंघन से समाज पर बाधाएं आती हैं।

कथन शैली से निष्कर्षित पाठ

- पाप का दंड: जब समाज नैतिक मूल्यों से भटकता है तो परमेश्वर न्याय की मूर्ति बनकर क्रोध प्रकट करते हैं।

- दयालुता की प्रतीक्षा: ईश्वर प्रतिशोध के बीच भी पथ-प्रशस्त करते और सुधार के लिए रास्ते खोलते हैं।

- प्रश्न-चेतावनी: क्या हम अपने जीवन में ऐसे पापों से दूर रहते हैं जो समाज और परमेश्वर के बीच दूरी बढ़ाते हैं?

कथा-सम्बन्धी चेतावनी और व्यवहारिक takeaway

इस पाठ से हमें सिख मिलती है कि सामाजिक और आध्यात्मिक भ्र्ष्टाचार के ठोस परिणाम होते हैं। परन्तु ईश्वर के हाथ अभी तक बढ़े रहने का अर्थ है—तौबा और धर्म-निष्ठा के मार्ग को फिर से अपनाने का अवसर। अपने समुदाय के लिए न्याय, दया और सत्य के मानक बनाए रखें; व्यक्तिगत पवित्रता से ही सामूहिक उद्धार संभव है।

कर्ता-उद्धृत टिप्पणियाँ: Matthew Henry और Albert Barnes तथा Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से आवश्यक पुष्टि के सूक्ष्म बिंदु नीचे जोड़े गए हैं:

“क्रोध अभी तक बढ़ा हुआ है” (Matthew Henry) — यह दर्शाता है कि निष्क्रियता और पाप का क्रमिक दंड स्थगित नहीं होता; परमेश्वर के धैर्य के बाद भी न्याय का चक्र चलता है।

“परेशानी के बीच भी दया की धारा” (Albert Barnes) — दंड के साथ उद्धार की संभावना भी है जब लोग पलटते हैं और ईश्वर की आधिकारिता को मानते हैं।

Adam Clarke द्वारा संकल्पित अवलोकन: यह पाठ एक चेतावनी-आह्वान है कि पाप के परिणाम वास्तविक हैं और सामाजिक ढांचे के लिए खतरा हैं; परन्तु उद्धार की संभावना तब भी बरकरार है जब लोग सच्चे मन से लौटते हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 5:25 समानांतर पद और संबंधित वचन

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वे केवल बन्दियों के पैरों के पास गिर पड़ेंगे और मरे हुओं के नीचे दबे पड़े रहेंगे। इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।

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इस कारण प्रभु न तो इनके जवानों से प्रसन्‍न होगा, और न इनके अनाथ बालकों और विधवाओं पर दया करेगा; क्योंकि हर एक भक्तिहीन और कुकर्मी है, और हर एक के मुख से मूर्खता की बातें निकलती हैं। इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।

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