Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66Verse
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यशायाह 5:14 का सरल अर्थ
इस आयत में अग्निपथ के बावजूद अंधकार की प्रवृत्ति स्पष्ट है: अधोलोक ने अत्यंत लालसा करके अपना मुँह फैलाया है और उसकी वैभव-भीड़, आनंद-आनंदित सब रस, सब कुछ उसके मुँह में गिर पड़े हैं। इसका मूल संकेत है—जन-जीवन और समाज के भ्रष्टाचार का अन्तहीन उपभोग और परिणामस्वरूप आत्मिक शून्यता।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यशायाह 5 अध्याय एक प्रतीकात्मक कथा के रूप में इशारा करता है—यहोवा के प्रेम-ताप के विरुद्ध इज़राइल की नाप्लावफल, दमन-व्यग्रता, और धन-गुलाम हो जाने की प्रवृत्ति। शेर-आयतों के रूप में गढ़ी गई यह कविता यह दिखाती है कि लोक-जीवन के सुख-सामग्री के लिए लोग आत्म-धर्म और सामाजिक विवेक खो देते हैं, और अंततः मृत्यु-यात्रा का आरम्भ हो जाता है।
व्याख्यात्मक बिंदु
गतिशील विचार (संक्षिप्त थीम-लिस्ट)
अन्य संदर्भ (संक्षिप्त cross-references)
1) यशायाह 5:11-12—जहाँ नशे और मनोरंजन के व्यसन से लोग चेतना खो देते हैं; यह आयत उसी रवैये पर टिप्पणियाँ देता है।
2) इब्रानी 11:25—यही मूल्य स्पष्ट करता है कि मूर्त आनंद अस्थिर है,परमेश्वर के साथ जीवन शाश्वत आनंद देता है।
3) मत्ती 6:24—धन के साथ ईश्वर की सेवा कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकती है; वास्तविक मूल्य का प्रश्न उठाता है।
इन से मिलता-जुलता संदेश है कि संसारिक सुख अस्थायी होते हैं, पर परमेश्वर-आस्था स्थिर और जीवन्त रहती है।
चालू जीवन में संकल्प (संक्षिप्त निष्कर्ष)
हम कौन-से केन्द्र बनाते हैं—सामग्री की भूख या परमेश्वर के भय में पालन? यदि हम वैभव और आनंद को कुल साधन मानते हैं, तो अधोलोक जैसी प्रवृत्ति बढ़ सकती है। पर यदि जीवन का उद्देश्य परमेश्वर के साथ नज़दीकी बनाए रखना है, तब समाजिक-आधार भी स्थिर और उद्धारमय बन सकता है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (संदेशात्मक योगदान)
इस पद के संदर्भ में मैथ्यू हेन्री, अॅल्बर्ट बर्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणी-उद्धरणों का संक्षिप्त उल्लेख किया गया है, यदि उपलब्ध हों:
“धन-दौलत के भीतर भी आत्मिक-विप्लव हो सकता है; इसलिए ईश्वर की ऐंठ और न्याय की दृष्टि से वस्तुएँ क्षणिक मज़ा बनकर रह जाएं।”
नोट: यहाँ सटीक उद्धरणों का पूर्ण पाठ नहीं दिया गया है, परन्तु उक्त टिप्पणीकारों के भीतर ऐसी पंक्तियाँ समान भावनाओं को व्यक्त करती हैं।