ओबद्याह 1:14 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तुझे उचित नहीं था कि चौराहों पर उसके भागनेवालों को मार डालने के लिये खड़ा होता, और संकट के दिन उसके बचे हुओं को पकड़ाता।।

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ओबद्याह 1:14 पद-दर-पद बाइबल टीका

ओबद्याह 1:14 पर उनका मुख्य व्याख्या बिंदु

यह पद एक तीखी चेतावनी देता है कि चौराहों पर भागने वालों के लिये निश्चय ही सहायता और सुरक्षा की अपेक्षा करना मूर्तायित है जब सरकार और समाज के ढांचे में खतरे का वास होता है। यहाँ यह दर्शाया गया है कि बुराई के दिनों में शत्रु के भय से भागना या अपने भाइयों को संकट के समय छोड़ देना एक असत्य और निष्क्रिय नैतिक प्रतिक्रिया है; ईश्वर के न्याय के सामने such भागना उचित नहीं है। इसी संदेश के साथ यह भी स्पष्ट होता है कि पवित्रनगर और रोगी समाज में अपराधियों व पतितों के प्रति एक आकाशीय प्रतिक्रिया आवश्यक है—न्याय और दया का संतुलन।

साहित्यिक संदर्भ (पाठ्य-विन्यास)

ओबद्याह के पुस्तक में यह श्लोक उत्तर-दक्षिण के सामाजिक व्यवहार को उजागर करता है, जहाँ एडुम (एडोम) के लिए क्रोधपूर्ण आह्वान है कि उसके भागनेवालों को, संकट के समय, सुरक्षित स्थान नहीं मिलना चाहिए। यह चेतावनी उनके आंतरिक ढांचे—घातक हिंसा, राज्य की व्यवस्था और पड़ोसियों के साथ विश्वासघात के विरुद्ध—के विरुद्ध है। संपूर्ण टेक्स्ट में इस अध्याय की परियोजनात्मक कसौटी है कि परमेश्वर न्यायप्रिय है और उसने इजराइल के साथ अन्याय के विरुद्ध कदम उठाए हैं।

theological संकेत

- न्याय और दया: यह श्लोक स्पष्ट करता है कि संकट के समय उन लोगों को बचाने की कोशिश करना जो चोट पहुँचा सकते हैं, लेकिन साथ ही बदले की आग भी सुलगती दिखती है।
- समुदाय की नैतिकता: समाज के भीतर धोखा और भागने की प्रवृत्ति न सिर्फ विशिष्ट अपराध है, बल्कि कुल मिलाकर सामुदायिक स्वास्थ्य के लिये खतरा है।
- divine sovereignty: परमेश्वर की योजना में हर अन्याय का निर्णय उसी के हाथ है; मानव भागना भी उसी योजना के भीतर चुनौती बनता है।

कई प्रमुख टिप्पणीकारों की प्रेरणा (संक्षेप)

यह भाग कुछ मानक सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणीकारों के दृष्टिकोण से समेकित है:

  • Matthew Henry: भागना और चौराहों पर खड़े होना—यह न्याय और दया के बीच संतुलन की परीक्षा है।
  • Albert Barnes: समाज के लिये भागना एक अपराध की छाया है; ईश्वर के न्याय में यह उचित नहीं ठहरता।
  • Adam Clarke: इस श्लोक में ओबद्याह अतः यह बताता है कि परमेश्वर के प्रतिशोध के दिन भागना सुरक्षित नहीं होता।

सूत्र-सम्बन्धी क्रॉस-रेफरेंसेस

1) दाऊद के समय के न्याय-व्यवस्था के विरुद्ध भागना की चर्चा (उद्धरण-स्वरूप संदर्भ): यह दर्शाता है कि संकट के क्षणों में भी कर्तव्य और नैतिकता नहीं छूटनी चाहिए।

2) न्याय के दिन के प्रतिशोध का विचार (उद्धरण-स्वरूप संदर्भ): यह बताता है कि परमेश्वर के न्याय के सामने भागना असफलता है और सम्मिलित रहकर भी पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है।

3) रोम 12:17-21 जैसे शास्त्रीय पश्चिमी टिप्पणी के आधार पर विपत्ति के समय प्रेम और शांति बनाए रखना अधिक उचित है, न कि प्रतिशोध।

reflection questions (चिंतन के लिये)

  • संकट के समय आप किन स्थितियों में भागने की सोच करते हैं? यह क्यों गलत हो सकता है?
  • हटो नहीं—आप अपने समाज में कैसे न्याय और दया दोनों को संतुलित तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं?
  • परमेश्वर के न्याय और आशीर्वाद के बीच अपने व्यवहार को कैसे क्रमबद्ध किया जाए?

संक्षिप्त निष्कर्ष

ओबद्याह 1:14 निर्भयता के बजाय धर्मसत्य और समुदाय की जिम्मेदारी पर बल देता है। संकट के बीच भागना या किसी की सुरक्षा का अवसर भटकना, सीधे-सीधे अन्याय और विश्वासघात के समान है। परमेश्वर न्यायप्रिय है; इसलिए हमारा जवाब सुरक्षित-घेरों में भागना नहीं, बल्कि सत्य और करुणा के साथ खड़ा होना है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

ओबद्याह 1:14 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और आओ, हम यहाँ से निकलकर बेतेल को जाएँ; वहाँ मैं परमेश्‍वर के लिये एक वेदी बनाऊँगा,* जिसने संकट के दिन मेरी सुन ली, और जिस मार्ग से मैं चलता था, उसमें मेरे संग रहा।”

भजन संहिता 31:8 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
भजन संहिता 31:8 (HINIRV) »
और तूने मुझे शत्रु के हाथ में पड़ने नहीं दिया; तूने मेरे पाँवों को चौड़े स्थान में खड़ा किया है।

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यशायाह 37:3 (HINIRV) »
उन्होंने उससे कहा, “हिजकिय्याह यह कहता है कि 'आज का दिन संकट और उलाहने और निन्दा का दिन है, बच्चे जन्मने पर हुए पर जच्चा को जनने का बल न रहा।

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