प्रकाशितवाक्य 11:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जब सातवें स्वर्गदूत ने तुरही फूँकी, तो स्वर्ग में इस विषय के बड़े-बड़े शब्द होने लगे: “जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया और वह युगानुयुग राज्य करेगा।” (दानि. 7:27, जक. 14:9)

प्रकाशितवाक्य 11:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

प्रकाशितवाक्य 11:15 — संदर्भ और मुख्य उद्देश्य

प्रकाशितवाक्य 11 अध्याय का यह क्षण पृथ्वी-काल की प्रतिस्पर्धी शक्तियों के अंत और परमेश्वर के राज्य के पूर्ण प्रगटन की ओर संकेत करता है। सातवें स्वर्गदूत की तरही के साथ स्वर्ग से उच्चारण होता है कि “जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया और वह युगानुयुग राज्य करेगा।” यह दृष्य दानियएल के भविष्यवाणियों से मेल खाता है, जहाँ मसीह की सत्ता और अखंड राज्य का विचार आता है (दानि. 7:27)। यहाँ पवित्र भक्ति-समाधिकरण का उद्घोष है: परमेश्वर के राज्य का विस्तीर्ण और स्थाई शासन शुरू हो चुका है, और ईश्वर के लोग उस राज्य के अनुरूप अपनी आशा को दृढ़ करें।

मुख्य अर्थ

इस वाक्य के अनुसार परमेश्वर का राज सत्ता पुष्ट रूप से स्थापित हो चुका है और वह युगातीत शासन करेगा। इसका आशय यह है कि अंत-युग की योजना के अनुरूप पृथ्वी पर अन्य सभी राज्य और सत्ता अंतिम रूप से इस प्रभुवादी राज्य के सामने परास्त हो जाएगी। यह विश्वास देता है कि इस दृश्यमान संसार की अस्थिरता के बावजूद परमेश्वर का नियंत्रण और सुरक्षितता बनी रहती है।

कुंजी विषय

  • ईश्वर के राज्य की ऐतिहासिक शुरूआत: पृथ्वी पर इस दैवीय शासन का प्राकट्य अब शुरू हुआ है, भले ही अस्थायीं शक्तियाँ अभी भी अस्तित्व में हों।
  • मसीह की केंद्रीय भूमिका: मसीह वही हैं, जिनके अधिकार से यह राज्य संचालित होता है; उनकी सत्ता उद्धार के पूर्ण उद्देश्य से जुड़ी है।
  • अनंतता और स्थायित्व: यह राज अनंत और निरंतर है; उसका शासन काल-पर-काल नहीं, बल्कि युगानुयुग है।

関連 पद

1) दानियेल 7:27 — एक समान विचार: महिमा-राज्य का स्थायित्व और परमेश्वर के राज्य का अंतर्निहित अधिकार।
2) योहन्ना 18:36 — यीशु का राज्य इस दुनिया के राजाओं से भिन्न है; उसका राज्य दिल से आरंभ होकर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता है।
3) रोम 14:17 — परमेश्वर के राज्य का मुख्य गुण सुकून, धर्मीपन और प्रसन्नता है; बाह्य लड़ाइयों से ऊपर यह आंतरिक सत्य है।

इन संदर्भों में स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का राज्य किसी राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मिक-नैतिक परिवर्तन और प्रभुता की पूरी योजना है।

व्यावहारिक चिंतन

यह वचन हमें यह स्मरण कराता है कि विश्व की बेचैनियाँ कभी भी अंतिम नहीं, पर परमेश्वर का राज्य दृढ़ है। हमें विश्वास-योग्य जीवन जीना है: अपने हृदय और पथ को उस दिशा में ढालना है जो परमेश्वर के राज के अनुरूप है—न्याय, दया और विनम्रता। दिन-प्रतिदिन की स्थितियों में आशा बनाए रखें कि प्रभु का शासन धीरे-धीरे, पर निश्चित गति से प्रकट हो रहा है; हम उसके भागीदार बनें और दूसरे लोग भी इस राज्य के आकर्षण में आएँ।

संक्षिप्त सार

प्रकाशितवाक्य 11:15 कहता है कि परमेश्वर के राज्य का उद्घोष हो चुका है और मसीह के अधिकार से वह युगानुयुग के लिए स्थाई है। यह वाक्य हमें विश्वास, धैर्य और नैतिक जीवन की एक नई दिशा देता है: भगवान के राज के मूल्य और उपलब्धि को अपनी जिंदगी में महसूस करें, और उसी की आशीष से दूसरों को भी प्रेरित करें।

अंश में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के संकलित विचारों से मिलते-जुलते संकेत — उनके कुछ छोटे उद्धरण नीचे मिलते हैं:

“यह कानून नहीं, यह व्यवस्था है; प्रभु के राज्य का वास्तविक प्रवेश वह है जब प्रभु यीशु राजाओं के राजा बनकर सब पर शासन करेगा।” (जोड़ते हुए संदर्भ)

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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तब उसको ऐसी प्रभुता, महिमा और राज्य दिया गया, कि देश-देश और जाति-जाति के लोग और भिन्न-भिन्न भाषा बोलनेवाले सब उसके अधीन हों; उसकी प्रभुता सदा तक अटल, और उसका राज्य अविनाशी ठहरा। (प्रका. 11:15)

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दानिय्येल 7:27 (HINIRV) »
तब राज्य और प्रभुता और धरती पर के राज्य की महिमा, परमप्रधान ही की प्रजा अर्थात् उसके पवित्र लोगों को दी जाएगी, उसका राज्य सदा का राज्य है, और सब प्रभुता करनेवाले उसके अधीन होंगे और उसकी आज्ञा मानेंगे।' (प्रका. 11:15)

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प्रकाशितवाक्य 12:10 (HINIRV) »
फिर मैंने स्वर्ग पर से यह बड़ा शब्द आते हुए सुना, “अब हमारे परमेश्‍वर का उद्धार, सामर्थ्य, राज्य, और उसके मसीह का अधिकार प्रगट हुआ है; क्योंकि हमारे भाइयों पर दोष लगानेवाला, जो रात-दिन हमारे परमेश्‍वर के सामने उन पर दोष लगाया करता था, गिरा दिया गया। (प्रका. 11:15)

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