Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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पहला इतिहास 17:16 — दाऊद की दाखिल-उपासना और ईश्वर के सामने आत्म-स्वीकृति
यह वाक्य दाऊद के भवन-योजना के कुछ पलों के बाद का है। परमेश्वर ने दाऊद के दिल को सुनकर यह कहा कि उसका घराने को भी आशीष देगा, और तब दाऊद राजा भीतर जाकर यहोवा के सम्मुख बैठा, और प्रभु से अपने आप पर, अपने घर पर और भविष्य पर प्रश्न करता है। यह दृश्य यह दर्शाता है कि सत्ता और शक्ति के बीच भी एक नम्र, आत्म-समर्पित प्रतिक्रिया आवश्यक है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से मिली शिक्षा
इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि दाऊद ने अपनी महानता के बावजूद ईश्वर के सामने विनम्रता दिखाई। वह अपने अभिमान नहीं न ढालता, बल्कि परमेश्वर के आशीर्वाद के लिए आकांक्षा और कर्तव्य-धारणा दोनों में सचेत रहता है। इससे स्पष्ट होता है कि विश्वास में प्रभावी आशीष वही है जो ईश्वर के कार्यों के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा बनाए रखे।
महत्वपूर्ण शब्दों/छवियाँ
अन्य सन्दर्भ और उनके संकेत
यह दृश्य नीतिशास्त्र में आशीष, वचन-आस्था और ईश्वर की योजना के अनुरूप जीवन की देह-व्यवस्था को दर्शाने के तौर पर निकट अन्य ग्रंथों से जुड़ता है:
जीवन-प्रयोग
आज के विश्वासियों के लिए यह पाठ एक स्पष्ट नज़रिया देता है: सफलता के बीच भी परमेश्वर की दिशा के अनुसार ही आंतरिक मूल्यांकन और प्रार्थना करनी चाहिए। जब हम अपने ordination, परिवार, और समाज के दायित्वों के बारे में विचार करते हैं, तो हमें विनम्रता के साथ यह पूछना चाहिए: क्या मेरी योजना परमेश्वर की महानता के अनुरूप है? क्या मैं अपने स्वप्नों और लक्ष्य को परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार ढालता/ढालती हूं?
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त संदर्भ)
कथन-संक्षेप (उद्धृत उद्धरण नहीं): Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के टिप्पणी-धारों में यह विचार मिलता है कि दाऊद की यह प्रार्थना ईश्वर के साथ एक सार्वजनिक-व्यक्तिगत समर्पण का उदाहरण है, जहाँ स्वार्थ और महानता के बीच परमेश्वर की महत्ता सर्वोपरि रहती है। exact quotes are not provided here, but the spirit reflects their emphasis on humility before God and the divine purpose that surpasses human schemes.