Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकी1 तीमुथियुस 4:9 बाइबल पद की व्याख्या
1 तीमुथियुस 4:9 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है।
1 तीमुथियुस 4:9 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
1 तीमुथियुस 4:9 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 तीमुथियुस 1:15 (HINIRV) »
यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।
मुख्य व्याख्या का केंद्रबिंदु
1 तीमुथियुस 4:9 कहता है: “यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है।” इस वाक्य में पौलुस ने माइकल-समय के लिए एक दृढ़, विश्वसनीय विश्वास-आधार प्रस्तुत किया है: जो उद्धार के लिए आवश्यक है वह सच्चा है, और इसे न सिर्फ समझना बल्कि मानना भी चाहिए। यह वाक्य इस पाठ की वैश्विक दिशा-निर्देश बनता है—धर्मयोजना की सत्यता को मान्य कर आत्म-इनामन और संस्थान की प्रेरणा देता है।
पाठ-संदर्भ और साहित्यिक संरचना
पौलुस ने इस पत्र में आख्यान-फिटनेस और प्रशिक्षक-शासन के संदर्भ में ईमानदारी, अनुशासन और विश्वसनीयता के मानक स्पष्ट किए हैं। यहाँ “यह बात सच और हर प्रकार से मानने योग्य है” एक नीतिगत घोषणा है—यानी जो सुसमाचार की सच्चाई है उसे स्वीकारना और उसके अनुरूप जीवन बिताना चाहिए। इसे 4:9 में संकलित कर, लेखक ने विश्वासियों को कठिनाइयों के बीच स्थिर रहने के लिए प्रेरित किया है।
धार्मिक विचारधारा—तीन प्रमुख आयाम
कथा-संदर्भ से theological significance
यह छोटे वाक्यांश पूरे उद्धार के संदेश को पुष्ट करता है: ईश्वर की सच्चाई को पहचानना और उसे अपने जीवन का आधार बनाना। प्रेरित पौलुस ने मानवीय संदेहों के बीच विश्वासियों को दृढ़ रहने के लिए कहा; सत्य को सच मानना, और उसी के अनुरूप कर्म करना, उद्धार की दिशा तय करता है।
आयत-आयत संबंध (cross-references) और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
- रोम 12:2 से प्रेरणा मिलती है कि सत्य के अनुरूप परिवर्तित मस्तिष्क से ही जीवन का व्यवहार सुधरता है.
- 2 कुर 4:2-3, ईमानदारी और धार्मिक सच को प्रकाशित रखने के बारे में मार्गदर्शन देता है।
- 1 पतरस 1:22-23 में पवित्र शास्त्र की सत्यता और विश्वास के द्वारा नया जन्म प्राप्त करने की बात मिलती है।
Reflection questions (चिन्तन के प्रश्न)
निष्कर्ष
यह वाक्य एक सरल, परंतु गहरा सत्य है: ईश्वर की सच्चाई वही है जिसे अंततः स्वीकारना और उसी पर जीवन का निर्माण करना चाहिए। उद्धार की राह पर स्थिरता पाने के लिए इसे दैनिक विश्वास में अपनाएं—हर प्रकार से मानना और उसी के अनुसार जिएँ।
उद्धरण नोट: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणियाँ इस छोटे पंक्ति के सार को स्पष्ट करने में उपयोगी हो सकती हैं, परन्तु यहाँ हमने मौलिक संदेशहीनता को बनाये रखा है।