Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 राजाओं 10:1 2 राजाओं 10:2 2 राजाओं 10:3 2 राजाओं 10:4 2 राजाओं 10:5 2 राजाओं 10:6 2 राजाओं 10:7 2 राजाओं 10:8 2 राजाओं 10:9 2 राजाओं 10:10 2 राजाओं 10:11 2 राजाओं 10:12 2 राजाओं 10:13 2 राजाओं 10:14 2 राजाओं 10:15 2 राजाओं 10:16 2 राजाओं 10:17 2 राजाओं 10:18 2 राजाओं 10:19 2 राजाओं 10:20 2 राजाओं 10:21 2 राजाओं 10:22 2 राजाओं 10:23 2 राजाओं 10:24 2 राजाओं 10:25 2 राजाओं 10:26 2 राजाओं 10:27 2 राजाओं 10:28 2 राजाओं 10:29 2 राजाओं 10:30 2 राजाओं 10:31 2 राजाओं 10:32 2 राजाओं 10:33 2 राजाओं 10:34 2 राजाओं 10:35 2 राजाओं 10:36



पद का तुरंत परिवेश (Immediate Setting)
2 राजाओं 10:26 केContext में याक़ूब के वंशजों के हत्यारे एवं इम्मास्त्र की सत्ता के दौर के संघर्ष चित्रित होते हैं। जाचीरियों ने असीरियन और इस्त्राईल की नीतियों के बीच तानाशाही की स्थिति बनाते देखी। इस पद में बाल के भवन में लाठों को निकालकर फूँक देने की क्रिया, सत्ता के अत्याचार को समाप्त करने की चेष्टा और परमेश्वर के विरुद्ध उठे विपक्ष के विरुद्ध न्याय की प्रक्रिया का परिचायक है।
ईश्वरीय विश्वास और कर्तव्य का पाठ
यह पाठ दिखाता है कि परमेश्वर का नियम तथा धर्मयात्रा में भगवान के प्रति विश्वास ही अस्थिर सत्ता को भी चुनौती देता है। ऐतिहासिक घटनाओं के बीच यीशु‑ख्रीस्त के प्रतिपादन से नहीं, बल्कि परमेश्वर की सत्यता व प्रामाणिकता का उजाला दिखाई देता है। यह संकेत देता है कि धार्मिक मूर्तियों के स्थान पर सच्चे विश्वास और नीति‑नियंता के रूप में परमेश्वर की सत्ता सर्वोपरि है।
मुख्य शब्दों और छवियों की व्याख्या
संबंधित पाठ
– संदर्भ 1: परमेश्वर की न्यायप्रियता पर बल देता है कि सत्ता चाहे कितनी भी प्रभावशाली क्यों न हो, ईश्वर के बिना शक्ति स्थायित्व नहीं पाती।
– संदर्भ 2: मूर्तिपूजा के विरुद्ध निर्माणात्मक क्रिया, जहां देवालयों में नैतिक सुधार और सत्य के मार्ग की दिशा स्पष्ट होती है।
– संदर्भ 3: आस्थावान विश्वास का दृढ़ होना, क्योंकि परमेश्वर के सामने सत्य ही प्रमुख है और वह अत्याचार को रोकता है।
व्याख्या के लिए प्रमुख उद्धरण (उचित संदर्भ के साथ)
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक‑डोमेन टिप्पणियों की सारगर्भित धारा इस पाठ के मूल विचार की पुष्टि करती है: परमेश्वर की न्यायप्रियता और सत्ता के अधीन भी सत्य और धार्मिक नैतिकता की विजय संभव है; मनुष्यों की दमनकारी राजनीति के बीच भी ईश्वर का राज्य स्थिर रहता है। (इन टिप्पणीकारों के कोई पूर्ण वाक्यांश यहाँ उपलब्ध हों तो संक्षेप में उल्लेख किया जा सकता है।)
आज के संदर्भ में उपयोगी लागू चीजें
– अन्याय के सामने धैर्य बनाए रखें, परन्तु प्रार्थना और सत्य पर टिके रहें।
– परमेश्वर की सत्ता की चिंता से भयभीत न हों, बल्कि उसकी दिशा में आगे बढ़ें।
– समुदाय‑नैतिकता के लिए साहसपूर्वक सुधार की चेष्टा करें, मूर्तिपूजा या स्वार्थी संस्थाओं के सामने सत्य का पक्ष लें।