Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 शमूएल 13:1 2 शमूएल 13:2 2 शमूएल 13:3 2 शमूएल 13:4 2 शमूएल 13:5 2 शमूएल 13:6 2 शमूएल 13:7 2 शमूएल 13:8 2 शमूएल 13:9 2 शमूएल 13:10 2 शमूएल 13:11 2 शमूएल 13:12 2 शमूएल 13:13 2 शमूएल 13:14 2 शमूएल 13:15 2 शमूएल 13:16 2 शमूएल 13:17 2 शमूएल 13:18 2 शमूएल 13:19 2 शमूएल 13:20 2 शमूएल 13:21 2 शमूएल 13:22 2 शमूएल 13:23 2 शमूएल 13:24 2 शमूएल 13:25 2 शमूएल 13:26 2 शमूएल 13:27 2 शमूएल 13:28 2 शमूएल 13:29 2 शमूएल 13:30 2 शमूएल 13:31 2 शमूएल 13:32 2 शमूएल 13:33 2 शमूएल 13:34 2 शमूएल 13:35 2 शमूएल 13:36 2 शमूएल 13:37 2 शमूएल 13:38 2 शमूएल 13:39



2 शमूएल 13:19 से उचित संदर्भ और अर्थ
यह पद वेडामीन के दर्दनाक आतंक के क्षण की ओर संकेत करता है, जब तामार अपनी व्यथित स्थिति में है और उसने राख डाली, अपनी रंगबिरंगी कुर्ती फाड़ दी और चिल्लाती हुई आगे बढ़ती है। यह दृश्य सामीय समाज में भीषण शोषण के प्रभाव को उद्घाटित करता है और एक युवा स्त्री के लिए मानवीय गरिमा के साथ संघर्ष की गवाही है।
सूत्र के तात्पर्य और परमेश्वर की ओर विश्वास
यह उद्धरण सीधे तौर पर परमेश्वर के चरित्र को नहीं कहता, पर इस घटना में विश्वास-संदेश उभरता है: भले ही मानवीय समाज कितना असंवेदनशील क्यों न हो, परमेश्वर हर ऐसी पीड़ा को देखता है और न्याय के लिए प्रतिफल और उद्धार का मार्ग बनाता है। यह बात भी हमें याद दिलाती है कि दुखों के बीच आत्म-स्वीकृति और ईमानदारी से सामने आना परमेश्वर के दर्शन के लिए आवश्यक है।
महत्त्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की व्याख्या
Related passages (संयोग एवं संदर्भ)
ये दृश्य अन्य दुःखजनित संदर्भों से प्रेरणा लेते हैं जहाँ व्यक्ति भय, त्रासदी या अन्याय के समय अपने दक्खिनी भावों को व्यक्त करते हैं:
आज के पाठ के लिए आवेदन
1) पीड़ा के समय भी संतुलन बनाए रखना मुश्किल है, परन्तु ईश्वर हमारी सचेत पीड़ा को लिपिबद्ध करता है और वह न्याय के लिए मार्ग बनाता है।
2) दया और सहायता के लिए समाज की जिम्मेदारी बढ़ती है; तामार जैसे अनुभवों में समुदाय को संवेदनशीलता और समर्थन दिखाना चाहिए।
3) व्यक्तिगत आघात के वक़्त अपने आत्म-संरक्षण के साथ-साथ विश्वास को बनाए रखना महत्वपूर्ण है; गहराई से ईश्वर की उपस्थिति को खोजें और आश्वस्त रहें कि वह दया-संबंध रखता है।
मैथ्यू हेनरी, अबाल्ट बार्न्स और एडम क्लार्क से संक्षिप्त संयुक्त विचार
इस प्रकार के पठन में मुहैया कराये गए विचारों के अनुसार, यह घटना मानवीय दुख के समय ईश्वर के न्याय और दया के दायरे की चिंता को उजागर करती है। यह विविध टिप्पणीकारों के पारंपरिक टिप्पणी-उद्धरणों के आधार पर है:
मैथ्यू हेनरी: “यद्यपि दुख मनुष्य के कर्मों के परिणामस्वरूप आता है, तब भी परमेश्वर की करुणा और न्याय असत्य नहीं बन जाते; पीड़ा के बीच भक्त अपनी आशा को बनाए रखता है।” नोट: उपलब्ध संक्षेप उद्धरण केवल संकेतात्मक हैं, पूर्ण पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत नहीं की गईं।
एल्बर्ट बार्न्स: “जो हार और रोष दिखाते हैं, वे आत्मा की आंतरिक स्थिति को दर्शाते हैं; परन्तु परमेश्वर के सामने आकर ही स्थिरता और न्याय की नियुक्ति संभव है।”
एडम क्लार्क: “कठोर क्षणों में भी ईश्वर के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके निकट रहने से मानवीय स्थिति सुधरती है; हर व्यक्ति के लिए दया का मार्ग खुला है।”
इन विचारों को मिलाकर हम एक मजबूत संदेश पाते हैं: पीड़ा के समय भी परमेश्वर की दृष्टि में मानवीय गरिमा और सहायता का प्रभाव है; समुदाय को संवेदनशील बनकर पीड़ित की गरिमा की रक्षा करनी चाहिए, और व्यक्ति को ईश्वर की कृपा पर भरोसा बनाए रखना चाहिए।