Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 शमूएल 19:1 2 शमूएल 19:2 2 शमूएल 19:3 2 शमूएल 19:4 2 शमूएल 19:5 2 शमूएल 19:6 2 शमूएल 19:7 2 शमूएल 19:8 2 शमूएल 19:9 2 शमूएल 19:10 2 शमूएल 19:11 2 शमूएल 19:12 2 शमूएल 19:13 2 शमूएल 19:14 2 शमूएल 19:15 2 शमूएल 19:16 2 शमूएल 19:17 2 शमूएल 19:18 2 शमूएल 19:19 2 शमूएल 19:20 2 शमूएल 19:21 2 शमूएल 19:22 2 शमूएल 19:23 2 शमूएल 19:24 2 शमूएल 19:25 2 शमूएल 19:26 2 शमूएल 19:27 2 शमूएल 19:28 2 शमूएल 19:29 2 शमूएल 19:30 2 शमूएल 19:31 2 शमूएल 19:32 2 शमूएल 19:33 2 शमूएल 19:34 2 शमूएल 19:35 2 शमूएल 19:36 2 शमूएल 19:37 2 शमूएल 19:38 2 शमूएल 19:39 2 शमूएल 19:40 2 शमूएल 19:41 2 शमूएल 19:42 2 शमूएल 19:43



वाक्य का सीधा अर्थ
2 शमूएल 19:23 में राजा डानाव का निर्णय है कि शिमी को प्राण दंड नहीं मिलेगा, और उसने शपथ भी खाई। यह एक असफलता-पूर्वक सचेत निर्णय है, जो राजा के न्याय और दयालुता के बीच संतुलन को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यहोवा की व्यवस्था समाप्ति के समय गालिल के युद्ध के बाद राजा दावीद बनस्थल से लौटता है। शिमी, जो बज्नियाँ में रहता था, ने दावीद पर कुपित होकर उसका पीछा करते हुए अपमानजनक शब्द बोले थे (2 शमूएल 16:5-14). दावीद ने पहले शिमी को कष्ट देने के बजाय उसे दयालुता के साथ दंडित करने का विचार किया, ताकि उसकी प्रजा के बीच अशांति न हो। अंततः दावीद ने शपथ दी कि उसे क्षमा मिलेगा। यह घटनाक्रम राजसी दया, कानून और सांसारिक शांति-निर्माण के बीच की जटिलताओं को उजागर करता है।
व्याख्या के মূল बिंदु
संक्षिप्त विषयगत सार
सहयोगी पदों के साथ तुलना
कुछ पुरालेख-टिप्पणियाँ इस दृश्य को निम्न प्रकार से जोड़ती हैं:
प्रासंगिक cross-references और उनके तात्पर्य
1) 2 शमूएल 16:12 — अधीनस्थ व्यक्ति के अपमान के समय भी राजा की दया की राह पर झुकना संभव है, ताकि समाज में अशांति न फैले।
2) संScripture संदर्भ: केल्विन-स्तर के विचारों के अनुसार दया के साथ न्याय का संयोजन, संकट की घड़ियों में भी आचरण का मार्गदर्शन देता है।
3) सोच-विचार के लिए क्रिया-उद्धरण: न्याय की कसौटी यह है कि क्या निर्णय समाज को शांति और सार्वजनिक हित के अनुरूप ले जाता है।
निष्कर्ष और व्यावहारिक अनुप्रयोग
इस वाक्य से निकलता है कि नेतृत्व में दया और वचन-पालन आवश्यक हैं। परिस्थितियाँ कितनी भी कठोर क्यों न हों, लोग गलत भी हों, पर उच्च अधिकारी के रूप में दावीद जैसे उदाहरण यह सिखाते हैं कि शपथ-प्रतिज्ञा को सम्मान देना और व्यक्तिगत दया दिखाना समाज की स्थिरता को मजबूत करते हैं। एक सामान्य पाठक के लिए इसका पाठ-योग है: कठिन निर्णयों में भी करुणा को केंद्र में रखें; पर कानून और कर्तव्य के प्रति अपनी प्रतिज्ञा को न खोएँ।
कथन: “तुझे प्राण दण्ड न मिलेगा”—यह निर्णय एक संतुलन की मांग है, जिसमें दाम्भिकता नहीं, बल्कि सामाजिक-नैतिकता का विवेक काम करता है।