Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 शमूएल 19:1 2 शमूएल 19:2 2 शमूएल 19:3 2 शमूएल 19:4 2 शमूएल 19:5 2 शमूएल 19:6 2 शमूएल 19:7 2 शमूएल 19:8 2 शमूएल 19:9 2 शमूएल 19:10 2 शमूएल 19:11 2 शमूएल 19:12 2 शमूएल 19:13 2 शमूएल 19:14 2 शमूएल 19:15 2 शमूएल 19:16 2 शमूएल 19:17 2 शमूएल 19:18 2 शमूएल 19:19 2 शमूएल 19:20 2 शमूएल 19:21 2 शमूएल 19:22 2 शमूएल 19:23 2 शमूएल 19:24 2 शमूएल 19:25 2 शमूएल 19:26 2 शमूएल 19:27 2 शमूएल 19:28 2 शमूएल 19:29 2 शमूएल 19:30 2 शमूएल 19:31 2 शमूएल 19:32 2 शमूएल 19:33 2 शमूएल 19:34 2 शमूएल 19:35 2 शमूएल 19:36 2 शमूएल 19:37 2 शमूएल 19:38 2 शमूएल 19:39 2 शमूएल 19:40 2 शमूएल 19:41 2 शमूएल 19:42 2 शमूएल 19:43



मुख्य व्याख्या
2 शमूएल 19:20 में राजा दिनोशा के बाद भीष्म-व्याकुलता का एक दुर्लभ सत्य उभरता है: दास के रूप में अपनी कमज़ोरी पहचानना और अपने राजा के सामने दया की मांग करना। यहाँ दास बताता है कि उसने पाप किया है और अब अपनी हार मानकर प्रभु के सामने सर्वस्व अर्पित किया। यह वाक्यांश न केवल विनती-प्रकार का है, बल्कि एक आत्म-आत्मिक संकल्प भी है कि राजा के चरणों में समर्पण ही जीवन की मूल राह है।’
पाठ-पार्श्विक संदर्भ (साहित्यिक संदर्भ)
कहानी के संदर्भ में यह वक्तव्य उस क्षण का है जब डेविड की सत्ता-संघर्ष के बाद उसकी नैतिक स्थिति उजागर होती है। दास का प्रहरी-स्वर और उसके कष्टपूर्ण स्वीकार ने यह दर्शाया कि सत्ता के बीच भी विवेक और पाप-स्वीकार का स्थान होता है।
मुख्य पाठ-संदेश
पवित्र शास्त्र के साथ theological संकेत
यह उद्धरण पाप को स्वीकारने और शासक के सामने विनय के साथ आने की अनिवार्यता को उजागर करता है, जो कि आंतरिक परिवर्तन और दया की प्रक्रिया को दर्शाता है। दशम-आत्म-स्वीकृति और दया का पाठ यह दर्शाता है कि परमेश्वर की माफी उन लोगों के लिए है जो अपने पापों को वास्तविकता से देखते हैं और परिवर्तन के लिए प्रस्तुत होते हैं।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त) और उनका संक्षिप्त अर्थ
- प्रेरितों से संबंधित संकेत: दया और माफी के लिए तुल्य-स्वीकृति ज़रूरी है; - भविष्य-उद्धार के लिए विनयपूर्ण आचरण का उदाहरण; - ईश्वर की क्षमा के मार्ग में आत्म-ख़ुशी नहीं, बल्कि दया का अनुभव महत्वपूर्ण है।
विचार-प्रश्न (Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
कथन का मूल बोध यह है कि भले ही विनय और पाप-स्वीकारिता से भरी स्थिति शर्मनाक हो, पर ये ही मार्ग हैं जो हमें दया, क्षमा और नया जीवन दिलाते हैं। राजा के सामने आत्म-स्वीकृति से पूर्व-स्थिति नहीं बदलती, पर परमेश्वर की कृपा के लिए खुला द्वार खुलता है।
नोट्स: पूर्ववर्ती टिप्पणीकारों से संक्षेप उद्धरण
उद्धरणों के लिए उपलब्ध सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणीकारों से संदर्भ छाँटकर, सार स्वरूप प्रकटन किया गया है। विशिष्ट शब्द-चयन नीचे उद्धृत नहीं किया गया है, किन्तु इन विचारों का संगत अनुकरण नीचे दी गई बिंदुओं में समाहित है।