दानिय्येल 5:31 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और दारा मादी जो कोई बासठ वर्ष का था राजगद्दी पर विराजमान हुआ।

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दानिय्येल 5:31 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य व्याख्यात्मक नुक्ता

दानिय्येल 5:31 बताता है कि दारा मादी (दैरोशोश) 62 वर्ष की आयु में बग़दाद की राजगद्दी पर बैठा। यह वाक्य साम्राज्य के परिवर्तन और परमेश्वर की सत्ता के दृढ़ शासन का संकेत देता है—नबूकदनज्ज़ार के वंश का परित्याग नहीं, किन्तु परमेश्वर की व्यवस्था के अनिष्ट और उपयुक्त परिणाम की अभिव्यक्ति है।

साहित्यिक परिप्रेक्ष्य

यह पद "शेष पुस्तक" के समापन भाग में आता है, जहाँ बेलीशज़र की रात, हस्तलिखित लेख और मदी (दारा) के राज्यारोहन का वृत्तांत है। पूरे अध्याय में रातों-रात साम्राज्य का पतन, धार्मिक मूर्खता, और परमेश्वर के न्याय का प्रकट होना दिखाया गया है। वाक्य सरल है परंतु ऐतिहासिक और आख्यानिक क्रम को पूरा करता है: नबियों और इतिहासकारों ने घटनाओं को संक्षेप में बंद किया ताकि पाठक को यह स्पष्ट हो कि परमेश्वर ने राजा बदल दिए और नया राज बनवाया।

धार्मिक तथा theological महत्व

1) परमेश्वर की संहिता: यह घटना याद दिलाती है कि मानव शासन अस्थायी है; परमेश्वर समय पर राज्य बदलते हैं।

2) दुष्टता पर अनुमोदन नहीं: बेलीशज़र की दार्शनिक और आध्यात्मिक अनिच्छा के कारण राज की सत्ता छिन गई—यह न्याय का उदाहरण है।

3) ऐतिहासिक पुष्टि और दीनता: दारा मादी का नाम और आयु पाठ को ऐतिहासिक विश्वसनीयता देते हैं; इससे यह भी सिखाया जाता है कि परमेश्वर के कार्यों का पूर्ण लेखा-जोखा इतिहास में दर्ज होता है।

शास्त्रीय टिप्पणी और संक्षिप्त उद्धरण

मैथ्यू हेनरी का दृष्टिकोण इस घटना को परमेश्वर की वर्यवस्था और प्रकट न्याय से जोड़ता है; उन्होंने लिखा है, "परमेश्वर ही राज्यों का उत्थान और पतन करता है" (मैथ्यू हेनरी, संक्षिप्त उद्धरण)।

अल्बर्ट बार्न्स इस पाठ को राज्य की अस्थिरता और अधिकारियों की अशेवचित्तता के प्रति चेतावनी मानते हैं; उनके विचारों का सार यह है कि मानव महिमा अस्थायी है।

एडम क्लार्क ने भी यह रेखांकित किया कि यहां उम्र का उल्लेख कार्य और उत्तराधिकार की मान्यता के लिए दिया गया है, न कि केवल जैविक तथ्य के रूप में।

श्रेणीगत संबंध (क्रॉस-रेफ़रेंस)

  • यिर्मयाह 27–28: राष्ट्रों की उठान-बीठान और परमेश्वर की अनुमति—दानिय्येल में दिखे परिवर्तन का पृष्ठभूमि।
  • याहरूशलेम के पतन का वृत्तांत—2 राजा 24–25: बाभुल और यहूदा के संबंधी न्याय और दण्ड के समान पहलू।
  • रोमियों 13:1: संसार के प्रभुत्व का विनियमन—नए नियम में भी शासन संस्थाओं को परमेश्वर द्वारा स्थापित बताया गया है; यहाँ का इतिहास वही सिद्धांत प्रतिपादित करता है।

मनन करने योग्य प्रश्न

1) क्या आप देखते हैं कि आपके जीवन में किस तरह परमेश्वर लोगों और परिस्थितियों को बदलता है?

2) जब प्रभुत्व का स्थान परिवर्तन होता है, तो क्या हमारा भरोसा स्थिर रहता है या हम भयभीत हो जाते हैं?

3) राजनेताओं और शासकों के आचरण से प्रेरित होकर हम अपने निजी जीवन में किस नैतिक सतर्कता को अपनाते हैं?

संक्षिप्त निष्कर्ष

दानिय्येल 5:31 एक संक्षिप्त परन्तु निर्णायक वाक्य है जो इतिहास के परिवर्तन को परमेश्वर की योजनात्मक सत्ता से जोड़ता है। यह याद दिलाता है कि मानव गौरव क्षणभंगुर है और परमेश्वर ही राज्यों के उत्थान-पतन के अंतिम नियामक हैं। हेनरी, बार्न्स और क्लार्क के विचार हमें यह समझाते हैं कि इस छोटी सी सूचना में धार्मिक, नैतिक और ऐतिहासिक सबक निहित हैं—जो आज के पाठक के लिए भी प्रासंगिक बने रहते हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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मादी क्षयर्ष का पुत्र दारा, जो कसदियों के देश पर राजा ठहराया गया था,

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दारा को यह अच्छा लगा कि अपने राज्य के ऊपर एक सौ बीस ऐसे अधिपति ठहराए, जो पूरे राज्य में अधिकार रखें।

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