Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
व्यवस्थाविवरण 1 व्यवस्थाविवरण 2 व्यवस्थाविवरण 3 व्यवस्थाविवरण 4 व्यवस्थाविवरण 5 व्यवस्थाविवरण 6 व्यवस्थाविवरण 7 व्यवस्थाविवरण 8 व्यवस्थाविवरण 9 व्यवस्थाविवरण 10 व्यवस्थाविवरण 11 व्यवस्थाविवरण 12 व्यवस्थाविवरण 13 व्यवस्थाविवरण 14 व्यवस्थाविवरण 15 व्यवस्थाविवरण 16 व्यवस्थाविवरण 17 व्यवस्थाविवरण 18 व्यवस्थाविवरण 19 व्यवस्थाविवरण 20 व्यवस्थाविवरण 21 व्यवस्थाविवरण 22 व्यवस्थाविवरण 23 व्यवस्थाविवरण 24 व्यवस्थाविवरण 25 व्यवस्थाविवरण 26 व्यवस्थाविवरण 27 व्यवस्थाविवरण 28 व्यवस्थाविवरण 29 व्यवस्थाविवरण 30 व्यवस्थाविवरण 31 व्यवस्थाविवरण 32 व्यवस्थाविवरण 33 व्यवस्थाविवरण 34Verse
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सीधे अर्थ का संक्षेप
व्यवस्थाविवरण 32:5 युवा जाति के बारे में एक टिप्पणी है जिसमें कहा गया है कि वे टेढ़े-तिरछे हैं, बिगड़े हुए हैं, और यह उनका कलंक है। यह अलंकारिक वक्तव्य है जो परमेश्वर के नैतिक न्याय और उनकी असफलता की सूक्ष्म आलोचना प्रस्तुत करता है।
पृष्ठभूमि और पाठ-संदर्भ
व्यवस्थाविवरण का यह भाग उस समय का है जब येहोवा ने इस्राइल के लिए उनके पथ-निर्देशन के बारे में मूसा के नेतृत्व में निर्देश दिए, फिर हृदय परिवर्तन, धर्म-घटने और विद्रोह के संभावना-चेतावनापूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है। इस verse में प्रभावी रूप से कहा गया है कि यह जाति नैतिक रूप से सुधर नहीं पाई है—कभी-कभी उनके माता-पिता के विरुद्ध पुनरुक्त व्यवहार के कारण ही यह चेतावनी दी जाती है।
व्याख्यात्मक बिंदु
3 प्रमुख विचार (थीमैटिक सार)
संदर्भ-गीत (cross-references) और उनका तात्पर्य
1) मत्थाय 17:17—यह दुष्कृत्यों के कारण विश्वास-आधार पर टिप्पणी देता है; परमेश्वर की प्रतिक्रिया में दृढ़ता और कमज़ोरी के बीच संतुलन समझना सिखाता है।
2) रोम 3:23—यह बताता है कि सभी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से बाहर हैं; व्यवस्था-विवरण के आलोचनात्मक संदर्भ में नैतिक गिरावट का व्यापक पृष्टपोषण मिलता है।
3) यशाय 53:6—हम सब भटके हुए हैं; यह दृष्टिकोण व्यवस्था के चर्चा-पराक्रम के बावजूद मानव-घटना की गहराई दिखाता है।
पक्का किया गया निष्कर्ष
यह पाठ यह स्पष्ट करता है कि समान्य समुदाय की नैतिक दिशा, परमेश्वर के अनुसार मार्ग-निर्देशन में रहने के बजाय, समय-समय पर विकृत हो सकती है। एक स्वस्थ आस्था के लिए आलोचना के साथ आत्म-समर्पण और परिवर्तन की इच्छा आवश्यक है—ताकि समुदाय एक ईश्वरीय मानदंड के अनुरूप बढ़ सके।
विद्वान-व्याख्या से संक्षिप्त निष्कर्ष
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणी से जो संगत विचार मिलते हैं, वे एक साथ इस प्रकार बनते हैं: यह भर्त्सना एक चेतावनी है कि समुदाय नैतिक गिरावट के खतरे से चूक नहीं सकता; परमेश्वर की न्यायसंगतता और स्नेह–दोनों उसकी योजना में आवश्यक हैं; सुधार के लिए आंतरिक परिवर्तन की आवश्यकता है। उनके अप्रत्यक्ष उद्धरणों में यह संकेत मिलता है कि पथ-चयन में पीछे हटना और दूसरों पर कलंक लगना, परमेश्वर के विरुद्ध एक गंभीर दबाव बनता है, जबकि पथ-परिवर्तन ही सचमुच पुनरुज्जीवन संभव बनाता है।