Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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यशायाह 1:1 यशायाह 1:2 यशायाह 1:3 यशायाह 1:4 यशायाह 1:5 यशायाह 1:6 यशायाह 1:7 यशायाह 1:8 यशायाह 1:9 यशायाह 1:10 यशायाह 1:11 यशायाह 1:12 यशायाह 1:13 यशायाह 1:14 यशायाह 1:15 यशायाह 1:16 यशायाह 1:17 यशायाह 1:18 यशायाह 1:19 यशायाह 1:20 यशायाह 1:21 यशायाह 1:22 यशायाह 1:23 यशायाह 1:24 यशायाह 1:25 यशायाह 1:26 यशायाह 1:27 यशायाह 1:28 यशायाह 1:29 यशायाह 1:30 यशायाह 1:31



यशायाह 1:4 — पाप से भरी यह जाति
पद का सन्निवेश और संदर्भ: यशायाह के आरम्भिक अध्याय एक सतर्क आह्वान है जिसमें ईश्वर अपने चुने हुए लोगों के आचरण में गहरा दोष देखते हैं—झूठ, पाखंड, अन्याय और विधर्म की बढ़ती प्रवृत्ति। इस verse में संदूक-समाज की स्थिति एक गहरी उथल-पुथल की ध्वनि है। यह भगवान की दृष्टि में तुलनात्मक रूप से “घटी” स्थिति है, जहाँ मानवीय पाप और पापी संस्कार ने समाज को घटा दिया है।
ईश्वर की धारणा और विश्वास का संकेत
यह वचन उद्घाटन करता है कि परमेश्वर के सामने नैतिक भंग कितना गहरा है। पाप की गहराई से यह स्पष्ट होता है कि वह अपने लोगों से भिक्षा-स्वभाव और ईमानदारी की अपेक्षा करता है; परन्तु यहाँ विपरीत हो रहा है—समाज पाप से भरा है और वह अपने पवित्र ईश्वर को तुच्छ मानता है। यह न केवल व्यक्तिगत दोष है, बल्कि समूह-आचरण की समस्या है जिसमें समाज ने दखल लिया है और बाह्य धार्मिक-रितिरिवाज के भीतर भी आंतरिक मर्यादा टूट गई है।
महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की स्पष्टीकरण
संबद्ध पाठ और उनसे सीख
यशायाह 1:11–17 में अलांकार होता है कि धार्मिक कर्मकांड इतने सरल नहीं होते; यह आचरण की सत्यता और न्याय के साथ जुड़ाव चाहता है। यह भी कि 하나님 इच्छानुसार आह्वान है—अधर्म को त्यागना और दयालुता, न्याय और नम्रता के साथ जीना।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप) और उनके संबंध
- यशायाह 1:11-17: जलती आह्वान—रितियों से अधिक नैतिकता की मांग; तिरस्कार नहीं, बल्कि परिवर्तन-हृदय।
- हिजाक 1:4 (अन्य पाठ) में भी पाप और समाजिक दोष का चिंतन मिलता है: बाह्य आचरण के भीतर आन्तरिक भंग की निंदा।
- मत्ती 23:23-28: धार्मिक कर्मों पर आग्रह के साथ भी असत्य आचरण की निंदा; नियम के पीछे नैतिकता की वास्तविकता आवश्यक है।
आज के संदर्भ में अनुप्रयोग
- व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में पाप के विरुद्ध सचेतता बनाए रखना है: सांसारिक सुख-सुविधाओं के बीच परमेश्वर की पवित्रता को प्रमुख बनाना।
- धार्मिकता के बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक न्याय और करूणा चाहिए। सही आचरण, निष्कलंक व्यवहार और नफ़रत से परे प्रेमभाव ही समाज के पुनर्निर्माण का आधार है।
संक्षिप्त समेकन
यह verse एक चेतावनी है कि परमेश्वर की पवित्रता के विरुद्ध समाज की स्थिति केवल नैतिक भ्र्ष्टाचार नहीं, बल्कि उसके नजदीकी होकर भी उसकी महिमा को तुच्छ समझना है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सत्य और न्याय के साथ ईश्वर के सामने खड़े हों, न कि दिखावे के दायरे में फँस जाएँ।
हेडिंग: संदर्भ-केन्द्रित विचार
मूल संदेश यह है कि पाप और अधर्म की गहराई में ईश्वर के पवित्र उद्देश्य और उसकी महिमा परखनी चाहिए; तभी वास्तविक सुधार संभव है—न सिर्फ भौतिक कर्मकांड, बल्कि दिल-परिवर्तन के साथ।
महत्वपूर्ण उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से) — अगर उपलब्ध हों: इस विश्लेषण में हमने नीचे के शब्द-उद्धरणों को सीधे नहीं लिया है, परन्तु समृद्ध दार्शनिक समझ उनके समान धारणा से प्रेरित मानी जा सकती है।