Old Testament
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सभोपदेशक 9:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि जीविते तो इतना जानते हैं कि वे मरेंगे, परन्तु मरे हुए कुछ भी नहीं जानते, और न उनको कुछ और बदला मिल सकता है, क्योंकि उनका स्मरण मिट गया है।
सभोपदेशक 9:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सभोपदेशक 9:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 26:14 (HINIRV) »
वे मर गए हैं, फिर कभी जीवित नहीं होंगे; उनको मरे बहुत दिन हुए, वे फिर नहीं उठने के; तूने उनका विचार करके उनको ऐसा नाश किया कि वे फिर स्मरण में न आएँगे।

सभोपदेशक 1:11 (HINIRV) »
प्राचीनकाल की बातों का कुछ स्मरण नहीं रहा, और होनेवाली बातों का भी स्मरण उनके बाद होनेवालों को न रहेगा।

अय्यूब 14:21 (HINIRV) »
उसके पुत्रों की बड़ाई होती है, और यह उसे नहीं सूझता; और उनकी घटी होती है, परन्तु वह उनका हाल नहीं जानता।
सभोपदेशक 9:5 — immediate setting
इस पद में लेखक एक व्यावहारिक विचार प्रस्तुत करता है: जीवन के अंतिम सत्य से मनुष्यों को वास्तविक ज्ञान मिलता है, परन्तु मृत व्यक्ति संसार की घटनाओं में भाग नहीं लेते और उनका स्मरण बहुत 오래 नहीं रहता। यह पुस्तक की निरंतर मृत्यु एवं अनुभवगत वास्तविकताओं पर अस्थायी तादात्म्य का संकेत है।
यह पाठ क्या बताता है—ईश्वर-विख्यात विश्वास का तत्व
पद बताते हैं कि जीवित लोग ही सर्वाधिक जानते हैं कि वे मरेंगे; परन्तु मरने के बाद कुछ नहीं जानते और न उनको कुछ नया मिल सकता है। यहाँ आत्म-जीवन की सीमा को दर्शाया गया है: मृत्यु के बाद स्मृति और अनुभूति का क्षय हो जाता है, और अस्त्र-शस्त्र नहीं चला सकता। यह विचार जीवन के क्षणभंगुरत्व और इस जीवन के प्रयोजन पर बल देता है। परमेश्वर की दृष्टि में, जीवन चाहिए तो वह वर्तमान में प्रेम और कार्य के द्वारा है; म्रतक के बारे में अंधकार ही रहता है।
重要 शब्द और चित्रों का स्पष्टीकरण
संबंधित मार्गदर्शन—अन्य सार्थक संदर्भ
1) प्रेरित वाक्य: जीवन के क्षणभंगुरत्व पर गहराई देता है ताकि मनुष्य वर्तमान में ईश्वर के साथ स्थिर रहें।
2) कोटि-आस्थाओं के विपरीत, मृत्यु के बाद ज्ञान नहीं बनने का विचार—ताकि सांसारिक समय की महत्ता समझ आए।
3) कर्म-प्रेरणा: जीवित रहते हैं तो उनके कर्म और सोच प्रभाव डालते हैं; मर कर स्मृति न होने से उत्तरदायित्व कमी नहीं होती, परन्तु परिणाम केवल इस जीवन में ही जुड़ते हैं।
पढ़ने के अन्य हिस्से से मिलते-जुलते संदेश
– अन्य अंश जहां जीवन-केन्द्रित विवेक और मृत्यु के बाद के अस्पष्ट ज्ञान का विरोधाभास उभरता है, वह दिखाता है कि नीति और नैतिकता के लिए वर्तमान जीवन का सही उपयोग आवश्यक है।
आज के संदर्भ में प्रयोग
हमारे जीवन की गति और प्रतिस्पर्धा के बीच इस पद से सीख है कि अंतिम क्षण तक सजगता आवश्यक है। जीवन एक अवसर है—परिवार, मित्र और समुदाय के लिए प्रेम, न्याय और ईमानदारी का कार्य। मृत्यु के बाद स्मृति का अंत क्यों न हो, परन्तु हमारे today के निर्णयों से आत्म-सम्मान और ईश्वर के साथ संबंध बनते हैं।
स्वीकृत उद्धरण (public-domain टिप्पणीकारों से संकलित)
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क के समान विचारों से प्रेरित टिप्पणीकार इस विषय को उसी योजना में समेटते हैं: वे मृत्यु के बाद ज्ञान के क्षय को जीवन-ज्ञान के महत्व से जोड़ते हैं, ताकि व्यक्ति अपने वर्तमान कर्मों पर ध्यान दें।
Cross-references
1) अन्य वचन जो जीवित रहने की महत्ता को उजागर करते हैं—जितने भी जीवन के क्षण, वे परमेश्वर के सामने दायित्व को दर्शाते हैं।
2) मृत्यु के बाद स्मृति के अंत के बारे में विचार—जीवन के अंतिम दिन और परमेश्वर के न्याय के संदर्भ में दृष्टिकोण स्पष्ट होते हैं।
3) जीवन के उद्देश्य के बारे में एकीकृत शिक्षा—धर्म और व्यवहार की गड़बड़ियां नहीं, परन्तु सचेतनता और प्रेम का अभ्यास.
इस पाठ का सार यह है कि जीवन की तात्कालिकता के भीतर, मृत्यु के बाद के अज्ञान से विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि वर्तमान जीवन को ईश्वर के आशीष और सामर्थ्य के अनुसार जीना चाहिए, ताकि अंततः हमारे कर्मों का फल ईश्वर के साथ गहरे संबंध के रूप में रहे।