Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
एज्रा 10:1 एज्रा 10:2 एज्रा 10:3 एज्रा 10:4 एज्रा 10:5 एज्रा 10:6 एज्रा 10:7 एज्रा 10:8 एज्रा 10:9 एज्रा 10:10 एज्रा 10:11 एज्रा 10:12 एज्रा 10:13 एज्रा 10:14 एज्रा 10:15 एज्रा 10:16 एज्रा 10:17 एज्रा 10:18 एज्रा 10:19 एज्रा 10:20 एज्रा 10:21 एज्रा 10:22 एज्रा 10:23 एज्रा 10:24 एज्रा 10:25 एज्रा 10:26 एज्रा 10:27 एज्रा 10:28 एज्रा 10:29 एज्रा 10:30 एज्रा 10:31 एज्रा 10:32 एज्रा 10:33 एज्रा 10:34 एज्रा 10:35 एज्रा 10:36 एज्रा 10:37 एज्रा 10:38 एज्रा 10:39 एज्रा 10:40 एज्रा 10:41 एज्रा 10:42 एज्रा 10:43 एज्रा 10:44



एज्रा 10:21 का पार्श्व-परिदृश्य और गहरा तात्पर्य
यह पद एज्रा 10 में कुल मिलाकर पाप के कारण समुदाय के भीतर मंदिर-व्रत-सम्बन्धी पुनर्संरचना की प्रक्रिया का हिस्सा है। यहां हारीम की सन्तान से मासेयाह, एलिय्याह, शमायाह, यहीएल और उज्जियाह का उल्लेख है, जो यह दर्शाता है कि पवित्रीय व्यवस्था के भीतर व्यक्तिगत पाप के कारण समुदाय के कुछ सदस्य असंयत व्यवहार के कारण विशिष्ट किसी समूह से जुड़ते रहे। यह सूचित करता है कि अपनी गलतियों के परिणामस्वरूप पूजास्थल और पवित्र संबंधों को पुनः स्थापित करना एक सामूहिक उत्तरदायित्व है।
ईश्वर का चरित्र और विश्वास पर इसका संदेश
इस पाठ से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर स्वच्छता और पवित्रता को अधिक महत्त्व देता है: यदि समुदाय ने पाप किया है, तो उसे स्वयं अपने आचरण पर ध्यान देकर विश्वास और प्रतिज्ञा के अनुसार व्यवस्था को पुनः स्थापित करना होगा। किन्तु संदेश में वहीँ दया और सुधार भी है—ईश्वर अपनी कड़ी व्यवस्था के साथ माँग भी करते हैं कि लोग वास्तविक पश्चात्ताप करें और पवित्रता की राह पर लौटें।
मुख्य शब्दों और छवियों की स्पष्ट व्याख्या
अनुशंसित क्रॉस-रेफरेंस और उनके बिंदुवार अर्थ
1) अगर आप देखें तो पुनः प्रतिज्ञा और पवित्रता का तात्पर्य दूसरे बाइबल हिस्सों में भी आता है, उदाहरण के लिए दानीयेल/एस्ते के प्रसंग में ईश्वर की कृपा और सुधार का मेल। यह बताता है कि समुदाय के पुनः प्रवेश की प्रक्रिया विश्वास के सकारात्मक परिवर्तन की मांग करती है।
2) एक अन्य संदर्भ जो इस विचार को मजबूत करता है वह है द को लैजाने वाले पुराने विधान—जहाँ प्रायः अपराध के समय समुदाय मिलकर दोष-आरोप तय करते, परन्तु अंत में विश्वास और पश्चात्ताप से पुनः प्रवेश संभव होता है।
3) अंतत: पवित्रता की मांग और दोष-निवारण में गलती से सन्तोष नहीं मिलता; परन्तु ईश्वर के नियमों के अनुसार ही दोषी भी सुधार-यात्रा कर सकता है।
आज के लिए uygulan
आज के पाठ से सीखे जाने योग्य संदेश यह है: सार्वजनिक समुदाय में गलतियाँ होने पर भी ईश्वर के नियमों के अनुरोध के अनुसार आत्म-चेतना, पश्चात्ताप और परिवर्तन आवश्यक है। व्यक्तिगत पवित्रता और सामूहिक जिम्मेदारी एक साथ चलती हैं—स्व-स्वीकृति, क्षमा और सुधार से ही समुदाय फिर से पवित्रता के रास्ते पर आ सकता है।
सूक्ष्म उद्धरणों के साथ एक संक्षिप्त अभिलेख
यदि आप पूर्वकाल के व्याख्या-ग्रंथों से शब्द-शासन चाहते हैं, तो मैथ्यू हेन्री, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के कुछ शाब्दिक विचार नीचे के अनुभागों में मिलते हैं। इन उद्धरणों के लिए उपयोगी संदर्भ उनके मूल संकलनों में मिल जाते हैं:
• “धर्म के लिए सचेत पश्चात्ताप आवश्यक है, वरना पवित्रता का मान घटता है।” (Henri, पढ़ने पर भावार्थ)
• “ईश्वर अपने लोगों के नये सिरे से जीवन की मांग करते हैं, जिससे वे अपनी वादा-यात्रा में टिके रहें।” (Barnes, टिप्पणी से प्रेरित)
• “नवयुगीन सुधार तब तक नहीं होता जब तक दिल से परिवर्तन नहीं होता।” (Clarke, टिप्पणी से प्रेरित)
नोट: यहां उद्धृत सटीक वाक्यांश केवल संहिताओं के मूल टिप्पणियों से प्रेरित सार हैं; पूर्ण उद्धरण पाठ में दिए नहीं जा रहे ताकि संदर्भ-संयोजन बना रहे।