Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
एज्रा 2:1 एज्रा 2:2 एज्रा 2:3 एज्रा 2:4 एज्रा 2:5 एज्रा 2:6 एज्रा 2:7 एज्रा 2:8 एज्रा 2:9 एज्रा 2:10 एज्रा 2:11 एज्रा 2:12 एज्रा 2:13 एज्रा 2:14 एज्रा 2:15 एज्रा 2:16 एज्रा 2:17 एज्रा 2:18 एज्रा 2:19 एज्रा 2:20 एज्रा 2:21 एज्रा 2:22 एज्रा 2:23 एज्रा 2:24 एज्रा 2:25 एज्रा 2:26 एज्रा 2:27 एज्रा 2:28 एज्रा 2:29 एज्रा 2:30 एज्रा 2:31 एज्रा 2:32 एज्रा 2:33 एज्रा 2:34 एज्रा 2:35 एज्रा 2:36 एज्रा 2:37 एज्रा 2:38 एज्रा 2:39 एज्रा 2:40 एज्रा 2:41 एज्रा 2:42 एज्रा 2:43 एज्रा 2:44 एज्रा 2:45 एज्रा 2:46 एज्रा 2:47 एज्रा 2:48 एज्रा 2:49 एज्रा 2:50 एज्रा 2:51 एज्रा 2:52 एज्रा 2:53 एज्रा 2:54 एज्रा 2:55 एज्रा 2:56 एज्रा 2:57 एज्रा 2:58 एज्रा 2:59 एज्रा 2:60 एज्रा 2:61 एज्रा 2:62 एज्रा 2:63 एज्रा 2:64 एज्रा 2:65 एज्रा 2:66 एज्रा 2:67 एज्रा 2:68 एज्रा 2:69 एज्रा 2:70

एज्रा 2:35 पर अध्ययन-निबंध: संकलन-नज़र से एक पथ-निर्देशन
मुख्य व्याख्या बिंदु: एज्रा 2:35 में जो संख्यात्मक जानकारी दी गई है, वह यह दर्शाती है कि परमेश्वर के लौटे हुए लोग एक संगठित और संरचित समुदाय के रूप में पुनः स्थापना के लिए आगे बढ़ रहे थे। यह संख्या-गणना, भक्ति-योजनाओं और व्यवस्था-कायदे की पुनर्स्थापना का संकेत है; यह मानवेतर दायित्व और नेतृत्व-संयोजन के एक चरण का प्रतिनिधित्व करती है।
साहित्यिक संदर्भ (लेखकीय संदर्भ)
यह पद लेखकीय भाग में गणना-आधारित सूचित विशेषण देता है जो नेयामियों और एज्रा-दृष्टांत में प्रवास के बाद के पुनर्स्थापनाकाल की गति दिखाता है। छंद 2:35 साना के लोगों की संख्या के साथ साझेदारी करता है, ताकि समुदाय की विविधता और भागीदारी स्पष्ट हो। ऐसे व्याकरणगत विवरण यह संकेत देते हैं कि प्रजा का पुनर्गठन एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया थी, जिसमें प्रत्येक कबीले और परिवार की सहभागिता आवश्यक थी।
धार्मिक-तत्त्व ( theology )
इस verse का स्पष्ट संदेश यह है कि परमेश्वर अपने चहेतों को स्मरण और वापसी की प्रक्रिया के लिए तैयार करता है। तीन हजार छः सौ तीस का उल्लेख यह दिखाता है कि परमेश्वर की योजनाओं के अनुरूप समाज का पुर्नगठन ठोस संख्याओं और रिकॉर्ड से नियंत्रित होता है; यह विश्वास की सामूहिकता और जिम्मेदारी की पुनर्पुष्टि है। इस संदर्भ में प्रार्थना, पवित्रता और भक्ति-जीवन के नए प्रचलन की स्थापना भी संकेतित हो सकती है, क्योंकि लोग बाहर के विरोध-आँधड़ से नहीं, बल्कि एकजुट होकर लौटते हैं।
पवित्रशास्त्र के साथ संबंध (Cross references)
- हज़ारों लौटकर बस्तियों के पुनर्निर्माण से संबंधित अन्य भाग: यहूद-हानियों के अध्यायों में समुदाय-गठन का विचार मजबूत होता है, जहां प्रत्येक परिवार अपनी भूमिका निभाता है। संक्षिप्त संकेत।
- लौटने और पुनर्स्थापना के क्रम में कबीले-नियोजन की चर्चा के एक अन्य हिस्से से प्रेरणा मिलती है कि बहुधर्मी पथ पर भी समुदाय द्वारा परस्पर सहयोग जरूरी है। संक्षिप्त संकेत।
- समिति-निर्माण और पुकार के समय की संचित स्मृतियाँ: सामूहिक उत्तरदायित्व और देव-यात्रा के क्रम में यह संख्या इस बात की याद दिलाती है कि इतिहास के सभी प्रत्यक्ष-उद्धरणों के पीछे एक नैतिक धक्का है। संक्षिप्त संकेत।
पाठ-सम्पादन के लिए प्रश्न (Reflection Questions)
महत्वपूर्ण उद्धरणों के संकेत (Notes on quotes)
यह पाठ सीधे तौर पर किसी एक विशिष्ट टिप्पणीकार के शब्दों को उद्धृत नहीं करता; अतः मौलिक सार-निर्माण में मैथ्यू हेनरी, अलेक्जेंडर बार्न्स या एडम क्लार्क के कोई स्पष्ट संक्षिप्त बाण-उद्धरण यहां शामिल नहीं हैं। यदि आवश्यकता हो, तो उनके विचार-चिन्हों के अनुरूप समझदार-सार प्रस्तुत किया जाएगा।
संक्षिप्त निष्कर्ष
एज्रा 2:35 का यह संख्यात्मक उल्लेख एक संकेत है कि लौटे हुए बन्धु-समुदाय के पुनःनिर्माण में क्रमबद्धता, सहयोग और आध्यात्मिक उद्देश्यों की सामूहिक पूर्ति आवश्यक है। जैसे-जैसे देव-यात्रा में परिवार और कबीले एक साथ आते हैं, परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन-संयोजन को क्रमबद्ध बनाते हैं, वैसे ही आज भी स्थानीय-समुदायों में सेवा-योजना और पवित्र जीवन की पुनर्स्थापना संभव हो सकती है।