उत्पत्ति 17:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, “क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगा और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?”

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उत्पत्ति 17:17 पद-दर-पद बाइबल टीका

उत्पत्ति 17:17 का महत्व और संदर्भ

यह verses महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अविश्वसनीय पन्नों में भी ईश्वर के वादों की स्पष्टता दिखाता है। अभी तक एब्राहम के साथ परमेश्वर ने वादा किया था कि उसका वंश_REV होगा, परन्तु उनकी शारीरिक अवस्था और मानव-सीमा के कारण आकाशीय योजना की संभावना पर सहज संदेह उठ खड़ा होता है। इस आयु में पुत्र की कल्पना एक बड़ी बाधा लगती है, परन्तु यह आयत ईश्वर के वचन की शक्ति की और संकेत करती है कि ईश्वर के वचन समय-सीमा नहीं देखते। हंसी और संदेह के बीच भी ईश्वर अपने उद्देश्य को पूरा करने की तैयारी में रहता है।

परिप्रेक्ष्य और मूल संदेश

उत्पत्ति 17 अध्याय में परमेश्वर ने अब्राहम से अपने पुत्र के नामकरण, वचनों के अनुरोध और चिह्न-स्वीकृतियों के बारे में बात की। 17:17 में अब्राहम ने मुँह के बल गिरकर हँसा और मन ही मन विचार किया कि क्या एक सौ वर्ष के व्यक्ति की संतान संभव है। यह प्रतिक्रिया मानव संदेह को दर्शाती है, पर ईश्वर का उत्तर और भविष्यवाणी इस संदेह से आगे बढ़कर आता है—ईश्वर के वचनों में निश्चय और संयम है। यह आयत बताती है कि ईश्वर कभी भी हमारे मानवीय सीमाओं को नहीं मानता; वह हमारे असंभव को भी संभव बना सकता है।

मुख्य विचार

  • ईश्वर की वाचा पर मानव अवलोकन का प्रभाव नहीं पड़ता; उसका वचन अटल रहता है।
  • हँसी एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है, परन्तु यह शुद्ध आस्था के लिए एक अवसर बन सकता है, ताकि प्रभु के दायरे में भय और संदेह को परखा जा सके।
  • विश्वास की परीक्षा में ईश्वर की कृपा और योजनाएं अद्भुत रूप से पूरा होती हैं।

क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)

यहाँ कुछ संबंधी आयतें जो इस विचार को मजबूत करती हैं:

  • रोमियों 4:18-21: अब्राहम ने प्रत्यक्ष प्रकांड असंभावना के बावजूद विश्वास रखा और परमेश्वर के वचन को मान लिया; यह हमारे लिए भी आश्वस्ति का आधार है कि विश्वास बेनतीजा नहीं।
  • यूहन्ना 6:37: जो कुछ भी पिता मुझे देता है, मैं उसे कभी नहीं निकाल दूँगा; ईश्वर के चयन और बुलाहट पर निर्भरता की स्मृति दिलाती है।
  • उत्पत्ति 21:1-2: ईश्वर के समय ने किया पुत्र का जन्म और उनके वादे की वास्तविकता को पुनः स्थापित किया; यह प्रेरणा देता है कि समय पर ईश्वर का काम चलता है।

पूर्वपूरी टिप्पणी से संकेत

हेल्लेमी पंक्तियों में Matthew Henry, Albert Barnes तथा Adam Clarke की दृष्टि स्पष्ट मिलती है: वे दिखाते हैं कि मानव-विश्वास की भंगुरता के बावजूद ईश्वर के वादे अचल रहते हैं; उनका आकलन यह है कि आत्म-विश्वास और पवित्रता के रास्ते पर चलना ही परमेश्वर के साथ गहरा सम्बन्ध स्थापित करता है। यदि कोई शब्द-युक्त व्याकुलता हो, तो भी ईश्वर की योजना अविचल रहती है।

अनुवादक-धारणा और पाठ-प्रेरणा

यहाँ HINIRV जैसी हिंदी संवेदनशील पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि परमेश्वर अपने वचनों की शक्ति से ही इतिहास को दिशा देता है। अगर हम भी मंज़ूर हों, तो हमारा विश्वास भी उसी दिशा में विकसित होता है जो ईश्वर ने निर्धारित की है।

DEVOTIONAL विचार

हर कठिन परिस्थिति जो हमें असमंजस में डालती है, उसे ईश्वर के वचन की रोशनी में देखें। वह व्यक्ति जो उम्र के पार भी संतान का वादा रखने के लिए तैयार है, वह हमारे हर स्वयं-निर्मित बाधाओं को भी कम कर सकता है। आज की स्थिति में यदि आप किसी लक्ष्य पर संदेह करें, तो स्मरण रखें: ईश्वर के वचन में शक्ति है; वह हमारे हृदय से संदेह हटा सकता है और पुरानी आशा को नवीन आशा में बदल सकता है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

उत्पत्ति 17:17 हमें सिखाता है कि ईश्वर के वचन पर विश्वास मानव अनुभव से ऊपर है। हाँ, हमारी प्रतिक्रियाएं प्राकृतिक हैं, पर परमेश्वर अपने वादों को पूरा करने के लिए प्रियजन के रूप में काम करता है। जैसे-जैसे आप अपने जीवन में विश्वास के स्तम्भ स्थापित करें, वैसे-वैसे ईश्वर की संपूर्ण योजना आपके सामर्थ्य के अनुरूप खुलती है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

उत्पत्ति 17:17 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और सारा ने कहा, “परमेश्‍वर ने मुझे प्रफुल्लित किया है; इसलिए सब सुननेवाले भी मेरे साथ प्रफुल्लित होंगे।”

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तब अब्राम मुँह के बल गिरा* और परमेश्‍वर उससे यह बातें करता गया,

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इसलिए सारा मन में हँस कर कहने लगी, “मैं तो बूढ़ी हूँ, और मेरा स्वामी भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा?”

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