Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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उत्पत्ति 40:15 — पंक्ति का संदर्भ और अर्थ
यही पाठ उस प्रसंग का दृश्य देता है जब जोसेफ के गुलाम दरबार में दो अन्य कैदी—राजकुमारों के साथ—स्वप्न-व्याख्या के कारण अपने-अपने भाग्य की बातें सुनाते हैं। यहां वह कहता है कि उसे इब्रानियों के देश से चुरा कर लाया गया है और उसे न्यायपूर्ण दोष के कारण नहीं बल्कि अन्यायपूर्ण कारागार में डालने का आरोप है। यह उद्घोष तत्कालीन परिस्थितियों में विश्वास और ईश्वर की व्यवस्था के प्रति आस्थावान दृष्टिकोण को उभारता है: भले ही परिस्थितियाँ विपरीत हों, परमेश्वर की योजना अपने समय पर पूर्ण होती है।
क्या बताता है यह पाठ परमेश्वर या विश्वास के बारे में
जोसेफ स्पष्ट करता है कि उसकी परिस्थिति किसी मानव के द्वारा नहीं, बल्कि एक बड़ी योजना के भाग के रूप में है। कारागार में होना और अपने देश से चुराये जाने की बात इसे समझाते हुए भी वह यह संकेत देता है कि ईश्वर ही वास्तव में नियंत्रण में हैं। इस संदर्भ में विश्वास यह है कि दर्द और असफलता भी परमेश्वर की अनुमति से आती हैं और अन्ततः उद्धार के लिए मार्ग बनाती हैं — जैसा कि आगे कथा में जोसेफ के संरक्षण और राज-सभा के उद्घाटन में स्पष्ट होता है।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टता
संबंधित बाइबल संदर्भ
- रोम 8:28 जैसे विचार जो बताते हैं कि परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार सभी चीजें मिलकर भलाई के लिए काम करती हैं; उद्धार-योजना के क्रम में दर्द भी भागीदारी बनता है।
- प्रवेश-यात्रा की कथा से जुड़ी अन्य घटनाएँ जहां दिखता है कि प्रताड़ना के बीच भी परमेश्वर का हस्तक्षेप होता है, जैसे जोसेफ की पूर्व घटना जिसमें उसे मिस्र की सत्ता में प्रतिष्ठा मिलती है।
- יתרकर 39:21 जैसे उदाहरण जो बताते हैं कि दास की स्थिति में भी ईश्वर उसकी रक्षा करते हैं और उसके भीतर की स्थिति बदलती है।
पवित्र-जीवन पर आज का अनुप्रयोग
कभी-कभी जीवन हमें ऐसी जगह ले जाता है जहाँ हम अपने आप को गलत समझे जाते हैं या injustices के शिकार बनते हैं। इस पाठ से शिक्षा यही है कि हमारे हालात चाहे जैसे भी हों, हम ईश्वर की पूरक योजना के अंग हैं। ईश्वर की देखरेख में धैर्य रखें, सत्य और अच्छाई के प्रति वफादार बने रहें, क्योंकि समय आने पर वह हमारे लिए सही मार्ग दिखाते हैं। भय के बजाय आत्म-विश्वास का रास्ता चुनना चाहिए, और दूसरे पात्रों के सहायता-योग की प्रतीक्षा करनी चाहिए जो परमेश्वर के उद्देश्य को पूरा करते हैं।
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से संक्षिप्त से निष्कर्ष
हमारी प्रतिक्रिया में गुलामी या अन्याय के बावजूद ईश्वर के नियन्त्रण की स्मृति Pastor Henry के अनुसार यह दर्शाती है कि ईश्वर हर परिस्थिति में सच सांत्वना देते हैं; Barnes से यह सीख मिलती है कि गलत आरोपों के बावजूद एक सच्चे विश्वास का दायित्व है; Clarke इसे ऐसे देखते हैं कि कष्ट भी उद्धार की प्रक्रिया का भाग हो सकता है।
छोटी cross-reference स्पष्टीकरण
1) रोम 8:28 – सभी चीजें मिलकर कर्म-सार का भाग बनती हैं; 2) उत्पत्ति 50:20 – आपदा को भी परमेश्वर की भलाई के अवसर में बदलना; 3) यहोवा के साथ धैर्य रहकर सच्चाई की रक्षा करना।
नोट: इस commentary में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke की विशिष्ट उद्धरण सीधे जोड़े जाने आवश्यक नहीं थे; यदि उपलब्ध हों तो छोटा-सा उल्लेख किया गया है।