Old Testament
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याकूब 1:20 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धार्मिकता का निर्वाह नहीं कर सकता है।
याकूब 1:20 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 1:20 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 तीमुथियुस 2:24 (HINIRV) »
और प्रभु के दास को झगड़ालू नहीं होना चाहिए, पर सब के साथ कोमल और शिक्षा में निपुण, और सहनशील हो।

इफिसियों 4:26 (HINIRV) »
क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे। (भज. 4:4)

याकूब 3:17 (HINIRV) »
पर जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया, और अच्छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपटरहित होता है।
याकूब 1:20 पर केंद्रित व्याख्या: क्रोध परमेश्वर की धार्मिकता का निर्वाह नहीं कर सकता
मुख्य interpretive बिंदु: क्रोध को नियंत्रित करना एक मसीही चरित्र का अभिन्न भाग है; मनुष्य का क्रोध परमेश्वर की धार्मिकता के अनुरूप दया और शांतिपूर्ण जीवन के विपरीत है। जब हम क्रोध से प्रकाशित प्रतिक्रिया दिखाते हैं, तो हम अपने क्रियाकलापों के माध्यम से परमेश्वर के उद्देश्य को अवांछनीय रूप से प्रभावित करते हैं। यह वचनों का निहित निर्देश है कि विश्वास के साथ जीते हुए क्रोध को दया, शांति और संयम में बदला जाना चाहिए।
साहित्यिक संदर्भ
इस वाक्य का अनुभवजन्य ढांचा yाकूब की पूरी पुस्तक में व्याख्यात्मक है जहाँ वह विश्वास के साथ कर्मों की संगति की चर्चा करता है। क्रोध यहां एक भाव है जो धार्मिकता के अनुरूप नहीं है। Matthew Henry के अनुसार क्रोध अक्सर हानिकारक और असंतुलित प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है; Albert Barnes इसे एक ऐसे आत्मिक रुझान के रूप में देखते हैं जो न्याय और व्यवस्था के खिलाफ चला जाता है। Adam Clarke क्रोध को एक मानवीय कमजोरी के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो परिशुद्धता और दयालुता के विरुद्ध है। इन टिप्पणीकारों से एक संगत निष्कर्ष निकलता है कि क्रोध से behaved actions में गिरावट आती है और यह ईमानदार जीवन के परीक्षणों में कमी कर देता है।
धर्मशास्त्रीय महत्व
1) क्रोध का स्रोत: यह पापी आवेश है जो दिल में बनी असंतोष और अहंकार से उभरता है। 2) क्रोध और धार्मिकता: परमेश्वर की धार्मिकता प्रेम, करुणा और शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देती है; क्रोध से यह रास्ता बाधित होता है। 3) नैतिक परिणाम: निर्ममता, आरोप-प्रत्यारोप, और रिश्तों में विघटन—ये सब क्रोध के कारण जन्म लेते हैं, जबकि ईमानदार जीवन के लिए माफी, संयम और समझ की आवश्यकता है।
पवित्र शास्त्र से संयोग (Cross-references)
विचार-विमर्श के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
याकूब 1:20 यह स्मरण कराता है कि धार्मिकता के मार्ग पर क्रोध की स्वचलित क्रिया बाधक है। सचेत नम्रता, दया और संयम परमेश्वर की धार्मिकता के अनुरूप जीवन जीने का मंत्र है। हर परिस्थिति में प्रेम और शांतिदायक मार्ग अपनाने की शिक्षा, हमें विश्वास के साथ कर्म के मेल को बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है।
उद्धरण संकेत: If applicable, excerpted lines reflect Matthew Henry, Albert Barnes, and Adam Clarke paraphrase/contextual notes. (कुल मिलाकर इन आलोचनाओं में क्रोध के विरुद्ध संयम और दया की प्राथमिकता पर बल रहा है।)