Old Testament
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याकूब 1:23 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि जो कोई वचन का सुननेवाला हो, और उस पर चलनेवाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्वाभाविक मुँह दर्पण में देखता है।
याकूब 1:23 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 1:23 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मत्ती 7:26 (HINIRV) »
परन्तु जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता वह उस मूर्ख मनुष्य के समान ठहरेगा जिसने अपना घर रेत पर बनाया।

याकूब 2:14 (HINIRV) »
हे मेरे भाइयों, यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो उससे क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास कभी उसका उद्धार कर सकता है?

यहेजकेल 33:31 (HINIRV) »
वे प्रजा के समान तेरे पास आते और मेरी प्रजा बनकर तेरे सामने बैठकर तेरे वचन सुनते हैं, परन्तु वे उन पर चलते नहीं; मुँह से तो वे बहुत प्रेम दिखाते हैं, परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है।
याकूब 1:23 का सीधा अर्थ
जो वचन सुनते हैं और उस पर चल नहीं पाते, वे उस व्यक्ति की तरह हैं जो अपना स्वाभाविक मुँह दर्पण में देखता है, पर फिर पीछे मुड़कर कुछ नहीं करते।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
याकूब की पुस्तक का यह भाग ईमानदारी और व्यवहारिक धर्म के बारे में है। दर्पण की उपमा प्रमुख है ताकि पाठक को स्पष्ट हो कि केवल सुनना पर्याप्त नहीं है; सचमुच परिवर्तन वही है जो कर्म के रूप में प्रकट होता है। यहाँ विशिष्ट रूप से यह बताया गया है कि वचन को सुनना एक पहली नज़र है, पर उसे जीवन में उतारना दूसरा चरण है।
व्याख्यात्मक विचार
पवित्रशास्त्री के निष्कर्ष (संक्षेप)
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क जैसे सांसारिक-उद्धरणों में से एक मिलनी चाहिए तो वे यह कह कर मार्गदर्शित करते हैं कि यह वचन-प्रयोग जीवन को ढालता है, न कि केवल कान से शब्द की ध्वनि सुनना। उदाहरण के रूप में वे उठाते हैं कि वचन का वास्तविक फल वही है जो नैतिक कार्रवाई, परिमार्जन और ईमानदार जीवन में दिखाई देता है।
संयुक्त दृष्टिकोण का सार
यह वचन हमें यह सिखाता है कि आधिकारिक सुनवाई और आस्था का वास्तविक परिणाम तब दिखेगा जब हम वचन को अपने व्यवहार में प्रत्यक्ष दें। अगर दृष्टि बनी रहे और अभ्यास न हो, तो दर्पण की झलक से लाभ नहीं हुआ। इसलिए दैनिक व्यवहार में छोटे-छोटे निर्णय भी वचन के अनुरूप धकेले जाएँ—मन, मुँह और कर्म में एकरुपता बनती है।
छोटा उपयोगी मार्गदर्शक सूची
अन्वयित पदों के संबंध में संक्षिप्त से उल्लेख
याकूब 1:22—कार्य के बिना केवल वचन सुनना आत्म-स्वीकृति में कमी बनाता है; यह याद दिलाता है कि विश्वास के साथ कर्म भी जुड़ना चाहिए। रोमन 2:13 जैसी शिक्षाएं यह स्पष्ट करती हैं कि केवल दायित्व या ज्ञान पर्याप्त नहीं; वास्तविक प्रतिदान वही है जो जीवन में परिवर्तन के रूप में सामने आए। इसलिए प्रेरित-उद्धार का अनुभव तब होता है जब वचन ईमानदारी से व्यवहार में उतरे।
कुल मिलाकर: वचन का सही प्रभाव वही है जो अंततः जीवन के हर क्षेत्र में मंशा और कर्म के संगम से प्रकट होता है, न कि सिर्फ कानों को सुनाई देने वाली ध्वनि तक सीमित।
संदिग्ध-उद्धृत टिप्पणियाँ: “जो सुनता है पर क्रिया नहीं करता, वह अपने स्वभाविक मुँह दर्पण में देख कर कुछ नहीं करता।” (संक्षिप्त व्याख्या, किसी एक प्रतिष्ठित पेरोकल्प के अनुसार)