याकूब 1:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है* जो हवा से बहती और उछलती है।

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याकूब 1:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

सन्दर्भ एवं संक्षिप्त व्याख्या

याकूब 1:6 याकूब के संशय और परीक्षा संबंधी प्रावचन के मध्य का पद है। यहाँ याकूब पहले कहता है कि जब कोई समझदार होकर परमेश्वर से प्रश्न करे तो उसे दिया जाएगा (याकूब 1:5)। उसी आग्रह के बाद वह चेतावनी देता है कि उससे जो माँगता है, वह विश्वास के साथ माँगे न कि सन्देह से; सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है—निर्णयहीन, अनिश्चित और अस्थिर। वचन का तात्पर्य यह है कि प्रार्थना और परमेश्वर पर निर्भरता में स्थिर विश्वास आवश्यक है वरना मन अस्थिर रहते हुए परिणाम नहीं पाता।

केन्द्रीय अर्थ

मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर से मदद माँगते समय मन का आश्वस्त और स्थिर होना आवश्यक है। याकूब यहाँ न केवल भावनात्मक भावना की बात कर रहे हैं, बल्कि निर्णय और अटूट भरोसे की। सन्देह से माँगना वह स्थिति है जहाँ मन में द्वैत होता है—एक ही समय में विश्वास और अविश्वास दोनों उपस्थि। ऐसी स्थिति में मन की लहरें उठती-गिरती हैं, इसलिए वह "समुद्र की लहर" की उपमा देता है।

मुख्य विषय

  • विश्वास की स्थिरता: प्रार्थना का उत्तर पाने के लिए विश्वास का ठोस और अडिग होना आवश्यक है।
  • निर्णय और निश्चय: आध्यात्मिक जीवन में अनिश्चितता बहुधा कार्रवाई और प्राप्ति को रोकती है।
  • आत्मनिरीक्षण: मन के द्विविध भावों की पहचान कर उन्हें हटाना याकूब का व्यावहारिक आग्रह है।

संबंधित पद और उनके सम्बन्ध

याकूब 1:6 को समझने में कुछ अन्य पद सहायक हैं:

  • याकूब 1:5 — यही अध्याय में पहले वचन से जोड़ता है; ज्ञान के लिए माँगने का निर्देश और इसके साथ विश्वास की आवश्यकता आती है।
  • हेब्रू 11:1 — विश्वास की परिभाषा और उसकी स्थिरता का बोध देता है; याकूब का आग्रह व्यवहार में विश्वास की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
  • मरकुस 11:24 — प्रार्थना में विश्वास और प्राप्ति के सम्बन्ध पर जीसस का उदाहरण; यह बताता है कि विश्वास के बिना प्रार्थना के प्रत्युत्तर का दावा करना कठिन है।

व्यावहारिक विचार

याकूब का रोगपरक सुझाव: जब आप परमेश्वर से किसी चीज की प्रार्थना करें तो पहले अपने मन के द्वंद्व का परिक्षण करें। क्या आप वास्तवीक रूप से विश्वास रखते हैं कि परमेश्वर सुनेंगे और दे सकेंगे, या आपके भीतर आशंका है? इस आत्मनिरीक्षण के बाद प्रार्थना करें, निश्चय और सम्मोहन के साथ। सन्देह आने पर उसे विनम्रता से परमेश्वर के समक्ष रखकर सत्य, अबाध विश्वास की प्रार्थना का अभ्यास करें। छोटे-छोटे निर्णयों में भारी विश्वास दिखाने से विश्वास बढ़ता है।

शिक्षाप्रद उद्धरण और टिप्पणी

मैथ्यू हेनरी ने लिखा है — "कोई ऐसा सत्य न चाहता है जो मन में दुविधा पैदा करता हो;" यह विचार याकूब के स्थिर विश्वास की आवश्यकता को संक्षेप में दर्शाता है। (उद्धरण संक्षेप और संदर्भ के लिए)।

संक्षिप्त समापन

याकूब 1:6 हमें सिखाता है कि ईश्वर से मिलने वाली सहायता के लिए केवल शब्दों की प्रार्थना पर्याप्त नहीं, बल्कि मन का ठोस भरोसा आवश्यक है। सन्देह मन को भटका देता है; इसलिए विश्वास को जागृत करना और उसे अभ्यास में लाना आध्यात्मिक जीवन का आवश्यक नियम है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

याकूब 1:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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यीशु ने उनको उत्तर दिया, “मैं तुम से सच कहता हूँ; यदि तुम विश्वास रखो, और सन्देह न करो; तो न केवल यह करोगे, जो इस अंजीर के पेड़ से किया गया है; परन्तु यदि इस पहाड़ से भी कहोगे, कि उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़, तो यह हो जाएगा।

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और विश्वास बिना उसे प्रसन्‍न करना अनहोना है*, क्योंकि परमेश्‍वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।

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ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से उनके भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की, हर एक वायु से उछाले, और इधर-उधर घुमाए जाते हों।

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