Old Testament
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न्यायियों 17:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
उसने अपनी माता से कहा, “जो ग्यारह सौ टुकड़े चाँदी तुझ से ले लिए गए थे, जिनके विषय में तूने मेरे सुनते भी श्राप दिया था, वे मेरे पास हैं; मैंने ही उनको ले लिया था।” उसकी माता ने कहा, “मेरे बेटे पर यहोवा की ओर से आशीष हो।”
न्यायियों 17:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
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न्यायियों 17:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
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नहेम्याह 13:25 (HINIRV) »
तब मैंने उनको डाँटा और कोसा, और उनमें से कुछ को पिटवा दिया और उनके बाल नुचवाए; और उनको परमेश्वर की यह शपथ खिलाई, “हम अपनी बेटियाँ उनके बेटों के साथ ब्याह में न देंगे और न अपने लिये या अपने बेटों के लिये उनकी बेटियाँ ब्याह में लेंगे।

रूत 3:10 (HINIRV) »
उसने कहा, “हे बेटी, यहोवा की ओर से तुझ पर आशीष हो; क्योंकि तूने अपनी पिछली प्रीति* पहली से अधिक दिखाई, क्योंकि तू, क्या धनी, क्या कंगाल, किसी जवान के पीछे नहीं लगी।

2 यूहन्ना 1:11 (HINIRV) »
क्योंकि जो कोई ऐसे जन को नमस्कार करता है, वह उसके बुरे कामों में सहभागी होता है।
न्यायियों 17:2 का तत्काल सार और पृष्ठभूमि
इस आयत में एक जनरल व्यवस्था-पूर्व कथा के भीतर छोटी लेकिन चित्ताकर्षक घटना देखने को मिलती है: एक युवक धन के लालच में अपनी ही माँ से चाँदी चुरा लेता है, और उसकी माँ यह मान लेती है कि यह धन Yahweh की आशीष है। यह स्थिति उजागर करती है कि तब के समाज में धार्मिक शब्द-रूप और नैतिकता के मानक भीतर कैसे विकृत हो चुके थे, और ऐसे समय में सत्य की कमी से व्यक्ति-परिवार और समाज पर कितनाNegative प्रभाव पड़ रहा था।
ईश्वर या विश्वास के बारे में यह पाठ क्या बताता है
यह अंश यह दिखाता है कि परमेश्वर के साथ गहराई से जुड़ा धर्मशास्त्र और आस्था, व्यवहारिक जीवन के भ्रष्टाचार से सुरक्षित नहीं रहता जब समाज में धन-लाभ का प्रभाव बढ़ता है। माता-पिता और पुत्र के बीच शामिल भावनात्मक और नैतिक गिरावट सुनियोजित रूप से प्रमुख है, पर परमेश्वर का नैतिक आदेश और उसकी इच्छा स्पष्ट है: चोर और धोखेबाज़ी के वित्तीय प्रकरणों का परिणाम समाज के लिए घातक हो सकता है।
महत्त्वपूर्ण शब्दों और इमेजों की स्पष्टता
संबद्ध दायरे से कुछ और आयतें
इसके साथ जुड़े कुछ संबद्ध आयतें जो इसी प्रकार नैतिक अस्थिरता और धार्मिक-आचार के मिश्रित चरित्र को उजागर करती हैं:
आज के संदर्भ में व्यावहारिक अनुप्रयोग
यह घटना यह सिखाती है कि आस्था केवल धार्मिक शब्दों तक सीमित नहीं होती—यह व्यवहारिक जीवन में स्पष्ट होनी चाहिए। घरेलू रिश्तों में ईमानदारी की कमी, धन-लाभ के लिए मसीही नैतिकता के मानकों से विचलन, और समुदाय में ईश्वर-आशीष के गलत अर्थों से सामाजिक-न्याय पर चोट पहुँचती है। व्यक्तिगत लक्ष्य के पीछे नैतिक सीमाओं को खोना बड़े संकट का कारण बन सकता है।
अनुशंसित क्रॉस-रेफरेंस और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) निर्गमन 20:15 — चोरी पर स्पष्ट निषेध; हमारी आचरण-झलक से प्रेरणा बनती है कि ईश्वर के आदेश से ऊपर कुछ भी नहीं।
2) निर्गमन 23:25 — परमेश्वर की सेवा से शांति और आशीष मिलती है जब हम उसे सही रूप में मानते हैं।
3) 1 इतिहास 29:14 — मानव प्रयास और धन के स्रोत के प्रति भगवान की कृपा की संतुलित आवश्यकता; स्रोत कैसे दान और पवित्रीकरण के साथ जुड़ता है।
संक्षेप में निष्कर्ष
यही दृश्य बताता है कि धार्मिक शब्दावली और आशीषें तब भी असंतुलित हो सकती हैं जब व्यक्ति और परिवार असमंजस में पड़ जाते हैं। सही दिशा वही है जिसमें धन के प्रलोभन के बावजूद ईश्वर के नियम और नैतिकता प्रधान रहें, और आशीषों का वास्तविक अर्थ उसे सम्मान के साथ मानना हो।
सूचियाँ उद्धरण (अनुमत, जो सार्वजनिक डोमेन से हैं): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संक्षिप्त कथन यदि उपलब्ध हों तो वे यहाँ आवश्यक हो सकते हैं।