Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
न्यायियों 21:1 न्यायियों 21:2 न्यायियों 21:3 न्यायियों 21:4 न्यायियों 21:5 न्यायियों 21:6 न्यायियों 21:7 न्यायियों 21:8 न्यायियों 21:9 न्यायियों 21:10 न्यायियों 21:11 न्यायियों 21:12 न्यायियों 21:13 न्यायियों 21:14 न्यायियों 21:15 न्यायियों 21:16 न्यायियों 21:17 न्यायियों 21:18 न्यायियों 21:19 न्यायियों 21:20 न्यायियों 21:21 न्यायियों 21:22 न्यायियों 21:23 न्यायियों 21:24 न्यायियों 21:25



न्यायियों 21:4 — पाठ का तात्कालिक संदर्भ और श्रद्धा की गहराई
इस वाक्य के पीछे की कथा का दृश्य मंदिर-प्रतिरूप और हृदय की आस्था के प्रतीकों को उजागर करता है। यह बताता है कि जीवन के विपरीत समय में भी लोगों ने ईश्वर के साथ संपर्क बनाए रखा और अपने समुदाय के लिए उत्सर्ग का मार्ग ढूंढ लिया। जिस सुबह वे उठा, वेदी बनाकर होमबलि और मेलबलि चढ़ाने का कदम उन्होंने एक बार नहीं, बल्कि समुदाय की व्यवस्था और सम्मान के साथ किया।
देवता और विश्वास पर खुलासा
यह पाठ पाठक को यह दिखाता है कि परमेश्वर के सामने औपचारिकता से अधिक ईमानदारी और समर्पण चाहिए — भले ही परिस्थिति कैसी भी हो। वेदी बनाकर होमबलि और मेलबलि चढ़ाने से यह स्पष्ट होता है कि वे अपने बंदोबस्त, प्रार्थना और विश्वास के अनुसार अपने परमेश्वर के पास आते हैं। होमबलि विशिष्ट समर्पण और प्रायश्चित का निर्देश है, जबकि मेलबलि समुदाय और धार्मिक परंपरा के साथ जुड़ा होता है। साथ ही, यह तस्वीर यह भी संकेत करती है कि पूजा के क्रम और विधानों का पालन धार्मिक जीवन का आधार है।
पद के महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की व्याख्या
अन्य पवित्र ग्रंथों से संबंध (क्रॉस-रेफरेंसेस)
यह दृश्य पुराने विधान में पूजा-अनुष्ठान के स्थायित्व और क्रम के महत्व की पुष्टि करता है। नीचे के संदर्भ मददगार संकेतक हैं:
आज के समय में अनुप्रयोग
आज के विश्वासियों के लिए यह संदेश स्पष्ट करता है कि पूजा का वास्तविक उद्देश्य केवल कर्म नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत और सामुदायिक संबंध को गहरा करना है। दिन की शुरुआत में भी, जब हम प्रतिदिन अपने प्रभु के समक्ष आते हैं, तो हमारा हृदय और हमारी शैली-रचना संकल्पित और दृढ़ होनी चाहिए। चाहे जीवन कितने भी व्यस्त क्यों न हो, परमेश्वर के सम्मुख एक स्पष्ट और दृढ़ आस्था के साथ आना चाहिए—खासकर कठिन समयों में जब भक्ति-कार्य एक संरचना और आश्वासन बन जाते हैं।
इस पाठ के सारांश में, परमेश्वर की महिमा और लोगों की आराधना एक साथ चलते हैं: एक व्यवस्था-आधारित श्रद्धा में भी जीवन के रोजमर्रा के क्षणों में ईश्वर के nnयकर्म और समर्पण की स्वीकृति दिखती है।
नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त, उद्धृत विचार शामिल हो सकते हैं, यदि उपलब्ध हों।