Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 17:1 लूका 17:2 लूका 17:3 लूका 17:4 लूका 17:5 लूका 17:6 लूका 17:7 लूका 17:8 लूका 17:9 लूका 17:10 लूका 17:11 लूका 17:12 लूका 17:13 लूका 17:14 लूका 17:15 लूका 17:16 लूका 17:17 लूका 17:18 लूका 17:19 लूका 17:20 लूका 17:21 लूका 17:22 लूका 17:23 लूका 17:24 लूका 17:25 लूका 17:26 लूका 17:27 लूका 17:28 लूका 17:29 लूका 17:30 लूका 17:31 लूका 17:32 लूका 17:33 लूका 17:34 लूका 17:35 लूका 17:36 लूका 17:37



लूका 17:12 का भावार्थ
युद्धिष्ठ रूप से कहा जाए तो इस वचन में यीशु के साथ आने वाले दस कोढ़ियों के मिलन का वर्णन है; उनमें से एक भीन लौटकर न आया, किन्तु जो स्वर्गीय अस्थिरता का सामना कर रहे थे, उन में से एक ही सिक्का-सी आशा लेकर लौटे। इसका स्पष्ट अर्थ है—कठोर रोग के बीच भी ईश्वर के दयालु क्रोध में एक पथिका निवर्तमान है: विश्वास के साथ प्रतिक्रिया से रोग और निर्जीव परिस्थितियाँ भी समर्पण की ओर मोड़ लेती हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
येशु अपनी यात्रा पर थे जब गाँव-गाँव से होकर वे जा रहे थे। लैव्यवाक्य 13:46 के अनुसार कोढ़ी लोग सामाजिक पृथक्करण और भेदभाव के अधीन रहते थे; वे शारीरिक और सामाजिक रूप से निषिद्ध महसूस करते थे। इस संदर्भ में यीशु से मिलने वाले लोग समुदाय से बाहर खड़े थे और उनसे मिलने की अनुमति माँगते थे।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विचार (थीम)
अन्य ग्रंथ-विचार (संदर्भ)
कथन के साथ संबद्ध संदर्भ जिनसे प्रेरणा मिलती है—
कैंची-सी संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
वर्तमान परिस्थिति चाहे कितनी भी कठिन हो, यीशु की निकटता और आस्था के संयोग से जीवन परिवर्तन संभव है। अस्थायी संत्रास के बीच भी धन्यवाद और परमेश्वर की कृपा स्मरणीय रहते हैं। जिससे सामाजिक छाया और आत्मिक दूरी घटती है।
संदर्भ-ग्रंथ
1) लूका 16:19–31 (धन-आनंद और सांसारिक चुभन के बीच क्रम) — आस्था के साथ संतोष बनाये रखना।
2) लूका 17:11–19 (धन्यवाद का महत्त्व) — एक ही लौटकर धन्यवाद देना कितना महत्वपूर्ण है।