Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 21:1 लूका 21:2 लूका 21:3 लूका 21:4 लूका 21:5 लूका 21:6 लूका 21:7 लूका 21:8 लूका 21:9 लूका 21:10 लूका 21:11 लूका 21:12 लूका 21:13 लूका 21:14 लूका 21:15 लूका 21:16 लूका 21:17 लूका 21:18 लूका 21:19 लूका 21:20 लूका 21:21 लूका 21:22 लूका 21:23 लूका 21:24 लूका 21:25 लूका 21:26 लूका 21:27 लूका 21:28 लूका 21:29 लूका 21:30 लूका 21:31 लूका 21:32 लूका 21:33 लूका 21:34 लूका 21:35 लूका 21:36 लूका 21:37 लूका 21:38

लूका 21:30 पर टिप्पणी
येहूशा ने लूका के अनुसार अंतःप्रभात के संकेतों को एक सरल दृश्य चित्र में प्रस्तुत किया ताकि उसके श्रोतागण समझ सकें कि छोटे परिवर्तन भी बड़े समय की बयार के संकेत बन जाते हैं। यहाँ “कोंपलें निकलना” एक कृषि-सम्बन्धी उपमा है जो यह दिखाती है कि ग्रीष्म ऋतु आने से पहले सारे संकेत अपने आप स्पष्ट हो जाते हैं। तब तक, जब तक फल-फूल दिख न दें, वे लोग समय की गिनती नहीं कर पाते; पर जब पत्ते और नई कोंपलें दिखाई दें, तो मौसम के परिवर्तन की गवाही मिल जाती है। यह संकेत दर्शकों को सतर्क रहने के लिए प्रेरित करते हैं कि भविष्य की घटनाओं के लिए तैयारी अवश्य करनी चाहिए।
केंद्रीय अर्थ
मसीह के उद्धारकार्य के संदर्भ में यह वाक्य यह सिखाता है कि भविष्य के बड़े परिवर्तन धीरे-धीरे दिखते हैं—जैसे पत्तों, कोंपलों से मौसम का एहसास हो जाता है। व्याख्या के अनुसार, विश्वासियों को किए जाने वाले उद्धार-कार्य और निर्णायक क्षणों के लिए सजग रहना चाहिए, भले वे अभी साधारण और सामान्य प्रतीत हों।
मुख्य विषय
संदर्भित पाठ
युवाओं और खेतिहर समुदाय के लिए प्रकृति के संकेत एक परिचित भाषा बन जाते हैं; ईश्वर की योजना के भीतर घटनाओं के क्रम को समझना मानवीय जीवन के लिए मार्गदर्शक है। नीचे दिए गए अन्य संदर्भ भी सहायता करते हैं: - मरकुस 13:28-29: समय के संकेत—वसन्त के बाद आने वाले दुरूह समय के बारे में जागरूक रहने का निर्देश। - मत्ती 24:32-33: शाक-पराग के संकेतों से बड़े घटनाक्रमों की याद दिलाई गई है ताकि लोग जाग जाएं।
धर्मशास्त्रीय विचारकों के सामान्य निष्कर्ष यह हैं कि प्रकृति के परिवर्तन मानवीय इतिहास के साथ संबद्ध रहकर एक प्रकार की चेतावनी देते हैं, और विश्वासियों का दायित्व है कि वे सजग होकर क्रियाशील रहें।
व्यावहारिक चिंतन
- अपनी दिनचर्या में आत्म-परीक्षण करें: क्या मैं वर्तमान अवसरों को सही रूप से पहचान रहा हूँ? क्या मैं आध्यात्मिक तैयारी में लगा हूँ?
- समुदाय के साथ मार्गदर्शन साझा करें: विश्वास की राह पर दूसरों को भी जागरूक करना कितना आवश्यक है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
इस छोटे उपमात्मक कथन के पीछे बड़ा संदेश है: मौसम के संकेत जैसे ही लगातार दिखते हैं, वैसे ही भगवान की चुनाव-यात्रा के संकेत भी धीरे-धीरे स्पष्ट होते हैं। हमें इनके लिए तैयार रहना है—विश्वास की संरचना मजबूत बनाकर, जीवन के हर क्षेत्र में ईमानदारी और सजगता के साथ आगे बढ़ना है।
संक्षिप्त क्रॉस-रेफरेंसे
- लूका 21:29-31 (नज़दीकी संकेत और तैयारी) — संकेतों को देखते हुए अनुयायियों का उचित व्यवहार।
- मत्ती 24:32-33 (शाक-पराग के संकेत से जागरूकता) — उस समय के आगे की योजना बनानी चाहिए।
- मार्क 13:28-29 (समय के संकेतों पर ध्यान) — प्रतीकों के माध्यम से पूर्वसूचना का महत्व।
ध्यान दें: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्थायी विचारों के संक्षिप्त संदर्भ आवश्यकतानुसार शामिल रहे, और जहां आवश्यक हो वहाँ उनके शब्दों से संकेत दिए गए हैं।