Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 3:1 लूका 3:2 लूका 3:3 लूका 3:4 लूका 3:5 लूका 3:6 लूका 3:7 लूका 3:8 लूका 3:9 लूका 3:10 लूका 3:11 लूका 3:12 लूका 3:13 लूका 3:14 लूका 3:15 लूका 3:16 लूका 3:17 लूका 3:18 लूका 3:19 लूका 3:20 लूका 3:21 लूका 3:22 लूका 3:23 लूका 3:24 लूका 3:25 लूका 3:26 लूका 3:27 लूका 3:28 लूका 3:29 लूका 3:30 लूका 3:31 लूका 3:32 लूका 3:33 लूका 3:34 लूका 3:35 लूका 3:36 लूका 3:37 लूका 3:38
लूका 3:24 परिप्रेक्ष्य में: पथ-संस्करण और दैनंदिन आस्था
immediate setting: यह पद यूहन्ना दक्खनी उपदेश के क्षण में आया है, जब यीशु के प्रेरितों के यात्रियों के क्रम में जन्म-पूर्व तैयारी की चर्चा चल रही है। लूका 3 अध्याय में यीशु के अभिशिखित होने से पहलेJohn the Baptist की प्रचार-यात्रा का समापन होता है और यहाँ भीतर-भीतर लोग स्वयं परखते हैं कि ईश्वर का राज्य कैसे आ रहा है। इस वाक्य में मत्तात, लेवी, मलकी, यन्ना, यूसुफ जैसे नाम नहीं केवल ऐकाउंट हैं, बल्कि विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग हैं—कर्मचारियों, शासक-हितैषियों, और सामान्य नागरिकों के बीच ईश्वर के निमंत्रण का समान प्रवेश स्पष्ट है।
ईश्वर के उद्देश्य और विश्वास के बारे में पाठ से निकलने वाले बिंदु
यह उद्धरण स्पष्ट करता है कि ईश्वर का निमंत्रण जात-पात, धन-सम्पत्ति, या सामाजिक स्थिति से ऊपर उठकर सभी के लिए है। हर असमानता के बावजूद, परमेश्वर के राज्य के लिए ज़रूरी है कि हम तेरह-गुणा नहीं, बल्कि पल-पल विश्वास में प्रार्थना और निष्कलंक आचरण के साथ प्रस्तुत हों।
महत्वपूर्ण शब्दों और रूपक की व्याख्या
संबद्ध आयतें/अनुरोध संदर्भ
1) लूका 3:12–14 में जनरल सामाजिक-व्यवहार और मनोभावनाओं के बारे में शिक्षण मिलता है कि लोग कैसे अमेरिका-प्रवृत्ति से मुक्त हों और परमेश्वर की व्यवस्था में उचितता को स्वीकारें।
2) मत्ती 22:37–39 में प्रेम के सबसे बड़े commandments के दोहराव से यह स्पष्ट होता है कि संबंध-ईश्वर के साथ और लोगों के बीच के प्रेम से जीवन का ढांचा बनता है।
3) एप्रेस 2:11–18 में यह दिखता है कि कैसे ईश्वर के राज्य में जाति-भेद टूटता है और सभी को एक नया परिवार मिलता है।
आज के जीवन में लागू करने के संकेत
- सभी पथ-निर्देशन और सेवाओं में ईश्वर के बुलावे को स्वीकारें, भले ही सामाजिक-status कुछ भी हो।
- दूसरों के साथ समान सम्मान और करुणा रखें; समुदाय-निर्माण में भागीदारी को प्राथमिकता दें।
- मजबूत आस्था के साथ नम्रता और सत्य की खोज में जीवन बनाएं; आस्तिक जीवन में पारदर्शिता और न्याय का मूल्य बनाये रखें।
हिंदी-विश्वास-तर्क के संदर्भ में, Matthew Henry के विचारों के सारांशतः: यह बताता है कि परमेश्वर के राज में हर व्यक्ति को अपने-अपने स्थान पर आकर दीन-भाव से आर्जित योगदान देना चाहिए; Barnes और Clarke के शब्दों के अनुसार, यह पुरस्कार मात्र बाहरी धर्म से नहीं मिलता, बल्कि कृपापूर्ण कानुनी-नियमों के पालन और आतंरिक परिवर्तन से मिलता है। यदि चाहिए हो, तो यह नज़रिया केवल एक-लाइन उद्धरण के रूप में इस पाठ से जुड़ा है: “ईश्वर का राज्य हर बिरादरी के लिए है” (संकेतित विचार-स्तर पर संक्षेपित)।
उद्धृत स्रोतों के लिए अनुमति: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के समानांतर विचारों को संक्षेप में समाहित किया गया है; किन्तु इन टिप्पणियों से पाठ के मूल संदेश को विकृत नहीं किया गया है।