Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 3:1 लूका 3:2 लूका 3:3 लूका 3:4 लूका 3:5 लूका 3:6 लूका 3:7 लूका 3:8 लूका 3:9 लूका 3:10 लूका 3:11 लूका 3:12 लूका 3:13 लूका 3:14 लूका 3:15 लूका 3:16 लूका 3:17 लूका 3:18 लूका 3:19 लूका 3:20 लूका 3:21 लूका 3:22 लूका 3:23 लूका 3:24 लूका 3:25 लूका 3:26 लूका 3:27 लूका 3:28 लूका 3:29 लूका 3:30 लूका 3:31 लूका 3:32 लूका 3:33 लूका 3:34 लूका 3:35 लूका 3:36 लूका 3:37 लूका 3:38



लूका 3:23 पर हिन्दिर्व पाठ के अनुसार एक विवेचना
पद-context: लूका 3:23 में कहा गया है कि यीशु जब उपदेश शुरू करने लगे, तब वे लगभग तीस वर्ष के थे और लोग मानते थे कि वे यूसुफ के पुत्र थे; और यह देह-परंपरा है कि वह एली के वंशधर माने जाते रहे। यह शुरुआत का क्षण है, जब प्रभु के सार्वजनिक मंत्रालय की नींव पढ़ी जाती है। लूका के अनुसार यह घटना ईसा मसीह के मानव-जीवन के आरम्भिक समय को दर्शाती है और उनकी पहचान और उद्धार के उद्देश्य को लेकर एक संकेत है।
पाठ के अध्याय में इसका स्थान
लूका 3 अध्याय में यीशु के जन्म-घटना के बाद की घटनाओं का विस्तृत क्रम प्रस्तुत किया गया है, जिसमें लौटायमान तैयारी और जहाज के मौसम के बजाय जन-समुदाय के बीच उपदेश का आरम्भ है। यह verse, यीशु की मानवीय आयु के साथ-साथ उनकी भूमिका की पुष्टि करता है—यह दिखाता है कि वे एक सामान्य युवक के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर-प्रेषित के रूप में प्रकट होते हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
मुख्य संदेश यह है कि यीशु का मंच पर आना एक आदर्श-उद्गोष है: वह अपने धर्म-कार्य की योजना के अनुसार, समय के विधानानुसार, प्रकट होते हैं। उनके बचानेवाले मिशन की गवाही लेने के लिए यह एक पवित्र आरम्भ है। यह verse सूचित करता है कि प्रभु के कार्य में मानव उम्र की सीमा नहीं बाधक है; बल्कि वे दयालुता के साथ संसार में प्रवेश करते हैं ताकि उद्धार का संदेश पहुँच सके।
अन्य सृजित बाइबल पाठों से तुलना
जीवंत अनुप्रयोग
हम आम तौर पर मानव जीवन के आरम्भ में अपने आप से पूछते हैं कि हम किस उद्देश्य के लिए बने हैं। यीशु के आरम्भ से यह खेल स्पष्ट होता है कि ईश्वर अपने कार्य के लिए समय और मार्ग बनाते हैं। हमारे लिए इससे सीख यह है कि हमें भी अपनी बुलाहट के अनुसार सत्य, प्रेम और सेवा के मार्ग पर चलना चाहिए, भले ही हमारी आयु या परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
2-3 cross-reference के संक्षिप्त स्पष्टीकरण
- मैथ्यू 3:17: पिता की आवाज और आत्मा का उतरना—यही दर्शाता है कि यीशु का मंत्रालय आधिकारिक रूप से परमेश्वर से अनुमोदित है।
- लूका 2:52: यीशु की बुद्धि और परमेश्वर-भाजन जीवन का विकास—यह बताता है कि योग्यता और पूजा-जीवन समय के साथ बढ़ते हैं।
- gal 4:4-5: समय के तत्पर पूरा होने पर ईश्वर का पुत्र बनना—उद्धार की योजना का पूर्ण रूप, जिसे यीशु ने अपने जीवन में पूर्ण किया।
सार-सार Deductive summary
लूका 3:23 हमें यह स्मरण कराता है कि यीशु का सार्वजनिक कार्य एक नियत समय पर आरम्भ हुआ। यह आयु-सीमा और यूसुफ के पुत्र-प्रथागत विचार को भी संकेत के रूप में स्वीकार करता है, ताकि लोग यीशु के मानव-चिह्न और ईश्वरीय संदेश दोनों को समझ सकें। यह verse हमें विश्वास देता है कि प्रभु हमने जिस उद्धार-योजना के लिए भेजे, उसे पूर्ण करने में उन्होंने व्यक्तिगत अवस्था और समाज के साथ संगति बनाए रखी।
सार भाव: प्रभु के कार्य की शुरुआत एक पवित्र क्रम और स्वीकृति से जुड़ी है; हमें भी अपने दायित्वों में संयम, नम्रता और सेवाधर्म के साथ बढ़ना चाहिए।
उद्धृत विशिष्ट मार्गदर्शक टिप्पणियाँ (जहाँ उपलब्ध):
मैथ्यू हैनरी,Albert Barnes,Adam Clarke से संक्षेप उद्धरण यदि उपलब्ध हों तो इन्हीं पंक्तियों में उल्लेखित होंगे।
नोट: उपर्युक्त विश्लेषण पवित्र ग्रंथ के भावार्थ पर आधारित है और पंथ-नुकसान से मुक्त, शुद्ध पवित्र व्याख्या को प्राथमिकता देता है।