Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 10:1 नीतिवचन 10:2 नीतिवचन 10:3 नीतिवचन 10:4 नीतिवचन 10:5 नीतिवचन 10:6 नीतिवचन 10:7 नीतिवचन 10:8 नीतिवचन 10:9 नीतिवचन 10:10 नीतिवचन 10:11 नीतिवचन 10:12 नीतिवचन 10:13 नीतिवचन 10:14 नीतिवचन 10:15 नीतिवचन 10:16 नीतिवचन 10:17 नीतिवचन 10:18 नीतिवचन 10:19 नीतिवचन 10:20 नीतिवचन 10:21 नीतिवचन 10:22 नीतिवचन 10:23 नीतिवचन 10:24 नीतिवचन 10:25 नीतिवचन 10:26 नीतिवचन 10:27 नीतिवचन 10:28 नीतिवचन 10:29 नीतिवचन 10:30 नीतिवचन 10:31 नीतिवचन 10:32



नीतिवचन 10:32 पर केंद्रित व्याख्या
मुख्य नुक्ता: धर्मी अपने वचन को समझकर, संयत रूप से बोलता है; परन्तु दुष्टों के मुँह से उलट-फेर और भटकावपूर्ण बातें निकलती हैं। इस आयत में सत्यता और परमुक्तता दोनों की कसौटी सुगी है: नैतिकता और संवेदनशीलता के साथ बोलना धर्म का परिचय है, जबकि दुष्टों की भाषा असंगतता, छली और हलचल पैदा करने वाली होती है।
साहित्यिक संदर्भ (पाठ-संदर्भ के अनुरूप)
नीतिवचन की इस पंक्ति में ہित्ती चैतन्य, और भाषिक नियंत्रण की महत्ता स्पष्ट है: धर्मी व्यक्ति अपने विचारों को स्पष्ट, संगत और आवश्यकतानुसार व्यक्त करता है; वह वात्सल्य और सत्य के साथ बोलता है। इसके विपरीत, दुष्टों की बोलचाल में असंगतता, धूर्तता और छल-छायाएँ बनी रहती हैं।
धार्मिक विचारधारा के आधार पर महत्व
यह आयत जीवन-नैतिकता और भाषा-नीति पर जोर देती है: भले विचारों को परिष्कृत शब्दों के साथ व्यक्त करना चाहिए ताकि सत्य और सज्जनता का अनुशासन बना रहे। सत्य बोलना और विमुख शब्दों से बचना, परमेश्वर के चरणों में विनम्रता और आत्म-निगरानी दर्शाता है।
कथा-संबंध (अन्य सुसंगत उधृतियों से संबंध)
- यैंत्रणों में भी कहा गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति की भाषा नर्म, स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण होती है; उसकी बातों में सत्य और उपकार का प्रभाव रहता है।
- अन्य पुस्तकों में भी भाषण की जिम्मेदारी पर बल दिया गया है: बारीकी से सोचा जाए कि बोले गये शब्द जीवन को बढ़ाव दें, न कि अराजकता फैलाएं।
पात्र-प्रश्न और विवेचन (मनन के लिए)
クロス-रेफरेंसेस (संक्षिप्त टिप्पणी)
1) याकूब 3:5-6 — वाणी की चोट और दिमागी नियंत्रण के महत्व पर सावधानी। छोटे शब्द भी बड़े प्रभाव डालते हैं।
2) मीशायह 50:4 — परमेश्वर की सेवा में बोलने की भाषा में सावधानी और नम्रता।
3) मरकुस 12:37 — शिक्षा और मुस्कान के साथ सच्ची बात को प्रस्तुत करना, ताकि सचाई स्पष्ट हो।
संक्षिप्त निष्कर्ष
नीतिवचन 10:32 हमें याद दिलाता है: सही और उपकारक शब्द शांत और स्पष्ट स्वभाव के साथ निकलते हैं, जबकि गलत फहमी और छल भड़काती है। धर्म का मूल दिखाने के लिए शब्दों की शुद्धता, नियंत्रण और प्रेम आवश्यक हैं।
महत्वपूर्ण उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke):
— Matthew Henry: “The righteous speak knowingly and well-placed; the slanderer and the wicked alter and twist words.”
— Albert Barnes: “Wisdom governs speech; folly scorns truth, and contrives to mislead.”
— Adam Clarke: “The mouth of the righteous gives forth wholesome words; the mouth of the wicked devours them with deceit.”