Old Testament
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रोमियों 8:1 रोमियों 8:2 रोमियों 8:3 रोमियों 8:4 रोमियों 8:5 रोमियों 8:6 रोमियों 8:7 रोमियों 8:8 रोमियों 8:9 रोमियों 8:10 रोमियों 8:11 रोमियों 8:12 रोमियों 8:13 रोमियों 8:14 रोमियों 8:15 रोमियों 8:16 रोमियों 8:17 रोमियों 8:18 रोमियों 8:19 रोमियों 8:20 रोमियों 8:21 रोमियों 8:22 रोमियों 8:23 रोमियों 8:24 रोमियों 8:25 रोमियों 8:26 रोमियों 8:27 रोमियों 8:28 रोमियों 8:29 रोमियों 8:30 रोमियों 8:31 रोमियों 8:32 रोमियों 8:33 रोमियों 8:34 रोमियों 8:35 रोमियों 8:36 रोमियों 8:37 रोमियों 8:38 रोमियों 8:39



रोमियों 8:7 का immediate setting
पौलुस इस अध्याय में जीवंत संघर्ष का चित्र प्रस्तुत करते हैं—आत्मा द्वारा परमेश्वर के बच्चे होना और शरीर की प्रवृत्तियों के साथ टकराहट। रोमियों 8:7-8 में वह स्पष्ट करते हैं कि जिस मानसिकता में शरीर की इच्छाएँ शासन कर सकती हैं, वह परमेश्वर के अनुरूप नहीं है। यहाँ “शरीर” से हमारा तात्पर्य वह प्रकृति है जो पाप से प्रभावित है और जो ईमानदार विश्वास के मार्ग में बाधा डालती है।
क्यों यह वाक्य परमेश्वर के साथ faith-जीवन का मूल बताता है
वाक्य कहता है कि शरीर पर मन लगना परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि वह न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है। इसका अर्थ यह है कि ईमानदार विश्वासियों के भीतर एक संघर्ष चलता है: आत्मा लौटकर परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप चलना चाहती है, जबकि शरीर की प्रकृति अपने आप को earthly impulses के हवाले कर देती है। यह न तो नैतिक कमज़ोरी मात्र है, बल्कि एक वास्तविक अस्तित्वगत द्वंद्व है जिसमें मसीह के साथ जुड़ाव और नई ज़िंदगी की इच्छा बार-बार चुनौती दी जाती है।
महत्वपूर्ण शब्दों/छवियाँ
शरीर यहां पापी प्रकृति को दर्शाता है—ऐसी प्रवृत्ति जो ईश्वर-निर्देश के विरुद्ध है।
मन लगाना समस्त प्रेरणाओं, इच्छाओं और चित्त की दिशा का स्रोत है; इसका मतलब है कि हम जहाँ भी जाएँ, हमारे विचार और कर्म उन मार्गों की तरफ झुकें जो परमेश्वर के विरोध में हैं।
संबंधित आयतें
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि विश्वासी जीवन एक दैनिक अंबे-जोखिम नहीं, बल्कि ईश्वर की आत्मा की सहायता से नियम और प्रेरणा पाने का मार्ग है।
प्रायोगिक पाठ
हमें सचेत रहना चाहिए कि शरीर की प्रवृत्तियाँ समय-समय पर ईश्वर की योजनाओं के विरुद्ध जाती हैं। परन्तु पवित्र आत्मा की सहायता से हम उन प्रवृत्तियों को दबाकर नया-जीवन जी सकते हैं। यह केवल नैतिक सुधार नहीं, बल्कि परिवर्तन-जीवन है—जहाँ हमारा विचार, हमारी चाहतें और our choices परमेश्वर के साथ संगत होते हैं।
आज के लिए अनुप्रयोग
कटौती-नोट
यह पाठ परमेश्वर और विश्वास के बीच के संतुलन का एक महत्त्वपूर्ण शब्द है—हम कैसे शरीर की प्रवृत्तियों के दबाव में परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन आना संभव बनाते हैं, यह एक सतत अभ्यास है।
अनुमानित संदर्भ उद्धरण (उपलब्ध public-domain commentators):
मथ्यू हेनरी, Albert Barnes, Adam Clarke—इनमें से कुछ विचारों का छोटा-सा सार अन्यत्र समाहित है: वे कहते हैं कि ईश्वर की कृपा चढ़ती-घटती स्थितियों में हमें आत्मीय दृढ़ता देती है; शारीरिक क्षेपक के विरुद्ध आत्मा की सत्ता आवश्यक है।