Old Testament
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याकूब 4:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे व्यभिचारिणियों*, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है? इसलिए जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है। (1 यूह. 2:15-16)
याकूब 4:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 4:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 यूहन्ना 2:15 (HINIRV) »
तुम न तो संसार से और न संसार की वस्तुओं से प्रेम रखो यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं है।

रोमियों 8:7 (HINIRV) »
क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है।

यूहन्ना 15:19 (HINIRV) »
यदि तुम संसार के होते, तो संसार अपनों से प्रेम रखता, परन्तु इस कारण कि तुम संसार के नहीं वरन् मैंने तुम्हें संसार में से चुन लिया है; इसलिए संसार तुम से बैर रखता है।
याकूब 4:4 का सरल अर्थ
इस वचन में प्रेरित याकूब स्पष्ट करते हैं: संसार से मित्रता करना परमेश्वर के साथ बैर मानना है। जो व्यक्ति संसार के साथ घुलना-मिलना चाहता है, वह अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति निष्ठा को विभाजित कर लेता है; इससे परमेश्वर प्रिय नहीं रहते। इसलिए “व्यभिचारिणियों” शब्द से उनका भाव स्पष्ट होता है—जो आत्मिक प्रेम में पृथ्वी के पदार्थों के पीछे भागता है, वह परमेश्वर के साथ विवाह के पवित्र संबंध को खतरे में डालता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
याकूब पत्र सामाजिक-धर्मिक संघर्षों के बीच लिखी गई एक नैतिक और व्यवहारिक चिट्ठी है। यहाँ विश्राम और प्रभु-भक्ति के बीच संघर्ष उभरता है—आस्तीन के साथ-साथ कदम से कदम मिलाने की मांग। 1 यूह. 2:15–16 की स्मृति देते हुए, यहाँ संसार के आकर्षण, धन, सांसारिक अनुमानों और आत्म-उच्चारण के संकेतों पर रोक लगाई गई है।
हृदयगत व्याख्या के चरण
महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ (संकेतक विचार)
यह संदेश स्पष्ट करता है कि ईश्वर-प्रिय व्यक्तित्व और संसार की चकाचौंध के बीच संतुलन असंभव नहीं, पर अस्थिर है। परमेश्वर का प्रेम स्पष्ट और केंद्रित होना चाहिए; संसार के आकर्षण यदि हमारे हृदय का प्रमुख भाग बन जाएँ, तो हमारी विश्वासनीयता, प्रार्थना और नैतिक आचरण प्रभावित होते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ और उनसे जुड़ी बातें
1) 1 यूह 2:15-16: इसी विषय का विस्तार: संसार के इच्छाएँ—आत्मा, लोभ, और पंक्ति में गिरावट—परमोच्च प्रेम के रास्ते में बाधक बनते हैं।
2) योहन्ना 15:19-20: विश्व से अलग रहने और समूह-संलग्नता के बीच सही दूरी बनाए रखने का सिद्धांत।
3) मत्ती 6:24: दो मालिकों की सेवा संभव नहीं; आप कौन-से दिल से मार्गन करते हैं, इसका स्पष्ट संकेत देता है।
पंजीकृत उद्धरण और स्रोत संकेत
यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke से सीधी उद्धृत पंक्तियाँ देखते हैं, तो वे इस प्रकार के विषयों पर अपने पारिभाषिक विवेचनाओं में यह स्पष्ट करते हैं कि “परमेश्वर के साथ संसार की मित्रता असंगत है” और यह आंतरिक प्रेम के एकरूप होने की माँग है। (ध्यान दें: नीचे उद्धृत शाब्दिक पंक्तियाँ संक्षेप में हैं और पूर्ण पाठ नहीं हैं।)
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
- परमेश्वर के प्रेम को केंद्र बनाएं; संसार की प्रवृत्तियों को प्रभु-भक्ति के मार्ग में नहीं आने दें।
- आचरण में एकरूपता बनाएं: विश्वास, प्रार्थना और नैतिकता की एक साथ चलती प्रेरणा।
- जीवन के निर्णयों में ध्येय स्पष्ट रखें: क्या यह कदम परमेश्वर के राज्य के लिए, या सांसारिक लाभ के लिए है?
निष्कर्ष
याकूब 4:4 चेतावनी देता है कि सांसारिक रुचियाँ और परमेश्वर-प्रेम एक साथ नहीं चल सकते। आत्मा को समर्पण और रुचि की पंक्ति में स्पष्टता लाने से ही सच्ची निष्ठा बनी रहती है।