Old Testament
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याकूब 4:9 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
दुःखी हो, और शोक करो, और रोओ, तुम्हारी हँसी शोक में और तुम्हारा आनन्द उदासी में बदल जाए।
याकूब 4:9 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 4:9 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 कुरिन्थियों 7:10 (HINIRV) »
क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक* ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है; जिसका परिणाम उद्धार है और फिर उससे पछताना नहीं पड़ता: परन्तु सांसारिक शोक मृत्यु उत्पन्न करता है।


याकूब 4:9 पर Commentary (HINIRV)
सीधे शब्दों में अर्थ: कठिन समय में वह हृदयचालक आग्रह कि दुःख को बाह्य आक्रमणों से स्वीकार किया जाए, ताकि आत्मा ऊँच-नीच के साथ सन्निहित हो सके। याकूब चाहता है कि विश्वासी अपने स्व-आनंद को छोड़ दें, शोक-भरे मन से ईश्वर के पास पहुँचे और नम्रता के साथ प्रार्थना करें ताकि परमेश्वर का शासन उनके जीवन में स्थिर रहे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
याकूब 4 में लेखक ईश्वर के स्थान पर मैंने-मैं-हूँ के रवैये के विरुद्ध उभरती तल्खी पर चर्चा करते हैं। इस पद में वे यह सिखाते हैं कि जीवन के सुख-दुःख दोनों परिस्थितियों में अपने आत्म-स्वार्थ को दबाकर परमेश्वर के चित्त के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। यह क्रम शोक, रोना और आंसुओं के स्वभाव को ईश्वर के सामने प्रस्तुत करता है, ताकि भीतर की मान्यता और बाहरी जीवन क्रमशः बदले जाएं।
व्याख्यात्मक बिंदु
शास्त्रीय सम्मिलन—घरों-घरों से विचार
मार्थवानों, ऐल्बर्ट बॉर्न्स, एडम क्लार्क के विचार संकलित करते समय, इस वाक्य के मूल भाव को तीन आयामों में समझना उचित रहता है: (1) आत्म-स्वार्थ की झड़प से ऊपर उठना और ईश्वर के वचन के अनुरूप व्यवहार करना; (2) शोक और आनंद के वैचारिक स्थान पर एक शुद्ध ईमानदार सूकृत मन का निर्माण; (3) जीवन की परिस्थितियों में नम्रता बनाए रखना ताकि ईश्वर की कृपा स्पष्ट हो सके।
संक्षिप्त विषयसूची
अन्य क्रॉस-रेफरेंसेस और संक्षिप्त व्याख्या
इन समर्थनों के माध्यम से स्पष्ट होता है कि दुख-समय भी विश्वास की गहराई और ईश्वर-आत्मनिर्भरता बढ़ाने का एक माध्यम हो सकता है, न कि केवल दुर्बलता का प्रमाण।
व्यावहारिक निष्कर्ष
जब जीवन में कष्ट आता है, तो मन को उच्छ्वास की जगह नम्रता, प्रार्थना और आस्था के संयोजन में ढाला जाय। यह verse हमें याद दिलाता है कि हमारी हँसी अस्थायी नहीं होनी चाहिए; उसे वास्तविक और स्थायी शांति की ओर मोड़ना चाहिए जो केवल ईश्वर के साथ निकटता से मिलती है।
अनुदेशित उद्धरण (Matthews Henry, Albert Barnes, Adam Clarke) से आवश्यक उधृतियाँ: “दुःखी हो, और शोक करो, और रोओ”—यह संकेत देता है कि प्रभु की दिशा में आंतरिक परिवर्तन ही वास्तविक उपहार है।