Old Testament
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याकूब 4:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग विलास में उड़ा दो।
याकूब 4:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 4:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 यूहन्ना 5:14 (HINIRV) »
और हमें उसके सामने जो साहस होता है, वह यह है; कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं*, तो हमारी सुनता है।

1 यूहन्ना 3:22 (HINIRV) »
और जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं; और जो उसे भाता है वही करते हैं।

याकूब 1:6 (HINIRV) »
पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है* जो हवा से बहती और उछलती है।
याकूब 4:3 परिप्रेक्ष्य में विवेचना
संकेत गरिमा: इस पद में याकूब हमें ध्यान दिलाते हैं कि इंसानी मांग कितनी बार ईश्वर के दृष्टिकोण से गलत कारणों से होती है। वह कहते हैं कि आप माँगते हैं और पाते नहीं, क्योंकि आप बुरी इच्छा से माँगते हैं ताकि अपने भोग विलास में उड़ा दें। यहर्थ है कि ईश्वर से माँगना तब सफल रहता है जब उसकी महिमा और राज्य पहले आते हों, न कि आत्म-लाभ ही प्राथमिक लक्ष्य बने।
सूत्र के वस्तुगत स्पष्ट विवरण
यह पद उन परिस्थितियों की ओर संकेत करता है जहां लोग ईश्वर को एक साधन के तौर पर देखते हैं ताकि उनकी निजी विलासिता पूर्ण हो सके। “बुरी इच्छा” से तात्पर्य वह अभ ko है जो ईश्वर के स्वरूप, न्याय या सामर्थ्य के विपरीत directed हो। परिणामस्वरूप माँग पूरी नहीं होती, क्योंकि यह मांग ईश्वरीय प्रेरणा से नहीं, वरन् स्वार्थ से संचालित होती है।
ईश्वर के प्रति विश्वास और माँग का सही रवैया
याकूब इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि आशीर्वाद परमेश्वर से आता है, परन्तु उसे सही नीयत के साथ ही पाया जा सकता है। यदि हमारी माँग स्वार्थ-संतुष्टि के लिए है, तो उसे स्थिर रूप से नहीं माना जाता। पर यदि हमारी प्रार्थना ईश्वर के राज के बढ़ते कदम और चरित्र-परिवर्तन के लिए है, तो परमेश्वर आशीषित करते हैं।
महत्वपूर्ण शब्द और imagery की व्याख्या
- "माँगते हैं": केवल तात्कालिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की इच्छा के अनुसार उनके लिए विशिष्ट आशीषों की प्रतीक्षा।
- "बुरी इच्छा": ऐसी इच्छाएँ जो ईश्वर के उद्देश्य के विरुद्ध भागती हैं; स्वार्थी लक्ष्यों की उथल-पुथल।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त)
संक्षेपण से स्पष्ट होता है कि प्रेरणा ईश्वर की महिमा के लिए हो और हमारा व्यवहार उसके नियमों के अनुरूप हो, तभी माँग पूरी होने का उद्घोष संभव है।
आज के संदिग्ध संदर्भ में अनुप्रयोग
- अपने प्रार्थनाओं की जाँच करें: क्या आपकी माँगें आत्म-स्वार्थ से प्रेरित हैं या ईश्वर के राज्य के विस्तार से जुड़ी हैं?
- ईश्वर के राज्य के लिए पहले प्रयास करें—यदि उद्देश्य स्पष्ट है, तो ईश्वर ज्यादातर समय आवश्यक आशीष प्रदान करते हैं।
- स्वार्थपूर्ण आकांक्षाओं के बजाय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखें, जैसे कि संतोष, धैर्य, और धन्यवादपूर्वक जीवन।
कथनात्मक सार
इस verses के भीतर याकूब एक कसौटी पेश करते हैं: हमारी मांगों की प्रेरणा और लक्ष्य क्या हैं? यदि वे ईश्वर-राज्य के अनुरूप हों, तो आशीषों की वर्षा संभव है; अन्यथा हमारी प्रार्थनाएँ निरुत्तर रह सकती हैं।
विचार-विमर्श: नीचे दिये गये चारों पंक्तियों के समन्वय से समझ आता है कि विश्वास में माँगना एक सजीव साथी है—पर यह तभी फल देता है जब माँगें भगवान के उद्देश्य के अनुरूप हों और हमारे दिलों की बुराई कम होती चले।
सूत्र-संदर्भ उद्धरणों के भीतर वास्तविक अंश केवल Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke से संक्षेपित यदि उपलब्ध हों, उनके नाम स्पष्ट रूप से उद्धृत किए गए हैं:
• “Matthew Henry” से कभी-कभी स्पष्ट टिप्पणियाँ यहाँ संलग्न होंगी; आवश्यक उद्धरण शीर्षकित नहीं होंगे।