Old Testament
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याकूब 4:12 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
व्यवस्था देनेवाला और न्यायाधीश तो एक ही है, जिसे बचाने और नाश करने की सामर्थ्य है; पर तू कौन है, जो अपने पड़ोसी पर दोष लगाता है?
याकूब 4:12 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
याकूब 4:12 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रोमियों 14:4 (HINIRV) »
तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है? उसका स्थिर रहना या गिर जाना उसके स्वामी ही से सम्बन्ध रखता है, वरन् वह स्थिर ही कर दिया जाएगा; क्योंकि प्रभु उसे स्थिर रख सकता है।

रोमियों 2:1 (HINIRV) »
अतः हे दोष लगानेवाले, तू कोई क्यों न हो, तू निरुत्तर है*; क्योंकि जिस बात में तू दूसरे पर दोष लगाता है, उसी बात में अपने आप को भी दोषी ठहराता है, इसलिए कि तू जो दोष लगाता है, स्वयं ही वही काम करता है।

मत्ती 10:28 (HINIRV) »
जो शरीर को मार सकते है, पर आत्मा को मार नहीं सकते, उनसे मत डरना; पर उसी से डरो, जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नाश कर सकता है।
याकूब 4:12 पर केंद्रित टिप्पणी
मुख्य interpretive बिंदु: जहाँ एक ही सत्ता—ईश्वर—वह न्याय करता है और व्यवस्था देता है, वहां मनुष्यों के लिए प्रेम और नम्रता का आह्वान है। यीशु-युक्ति के अनुसार, द्वितीय सत्ता के रूप में अदालत के अधिकार के बारे में हमें सावधान रहना चाहिए; हम केवल परम सत्ता के सामने अपने जीवन को प्रस्तुत करें, आपसी दोषारोपण से बचते हुए।
पठन-संदर्भ (साहित्यिक संदर्भ)
याकूब 4:12 वह कालखण्ड बताता है कि प्रभु एक ही न्यायाधीश हैं और उनके हाथ में जीवन और नाश की शक्तियाँ हैं। यह पंक्ति ईश्वरीय सर्वाधिकार को रेखांकित करती है, जो मनुष्यों के बीच हाकिम बनना चाहते व्यक्तियों के उन्मादी दावे को रोकती है। यह घटना-आधारित पाठ है—जो सामाजिक तनाव और विरोध को देख कर व्यवहारिक नैतिकता को उभारता है—कि हम एक-दूसरे पर दोषारोपण से बचें और परमेश्वर की व्यवस्था में विश्वास बनाए रखें।
धर्मशास्त्रीय महत्व
तत्वतः यह वाक्य दो सच्चाइयों को एक साथ जोड़ता है: परमेश्वर का एकतत्व न्याय और दयावत्व है। हमारे लिए सच्चे प्रश्न हैं—कौन मुझे बचाता है? किसके द्वारा मैं जीवन और नाश के अधिकारी के रूप में दावा कर सकता हूँ? याकूब स्पष्ट कर देता है कि यह अधिकार केवल ईश्वर के पास है; मनुष्यों का दखल केवल एक संदर्भ-भूमिका है, न कि एक समान अधिकार। यह humility और आत्म-नियंत्रण की मांग है: तुलना, दोष-आरोप, और अत्यधिक सम्मान के खेल से बचना चाहिए।
अनुच्छेद-समूह: एकीकृत टिप्पणी
याकूब 4:12 में तीन प्रमुख विचार एक साथ घुलते दिखते हैं: परमेश्वर के एकाधिकार का ज्ञान, मानवीय न्याय के अक्षम होने की मान्यता, और नम्र व्यवहार का आह्वान। टिप्पणीकारों के विचारों से मिलता-जुलता संकेत है कि शरीरिक समाज में निरन्तर द्वेष और आलोचनात्मक प्रवृत्ति होती है; परंतु ईश्वर के सामने हमारी भूमिका एक पवित्रता की है जिसमें हम एक दूसरे के विरुद्ध दोष-आरोपों से बचें।
Cross-References (संक्षेप में) और तात्पर्य
Reflection Questions (चिन्तन के प्रश्न)
संक्षिप्त निष्कर्ष
याकूब 4:12 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर ही जीवन और नाश के निर्णयकर्ता हैं। हमें एक-दूसरे पर दोषारोपण के खेल से बचते हुए, दयालु और नम्र सम्बन्ध बनाए रखना चाहिए, ताकि हमारा जीवन ईश्वर के एकत्वपूर्ण न्याय के अनुरूप हो।
नोट: इस पंक्ति के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण मिलते तो वे नीचे उद्धृत किए जाते; यहाँ आवश्यक सार-संयोजन के साथ उनके विचारों का निहित सार प्रस्तुत किया गया है।