Old Testament
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याकूब 4:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तुम जो यह कहते हो, “आज या कल हम किसी और नगर में जाकर वहाँ एक वर्ष बिताएँगे, और व्यापार करके लाभ उठाएँगे।”
याकूब 4:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 4:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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नीतिवचन 27:1 (HINIRV) »
कल के दिन के विषय में डींग मत मार, क्योंकि तू नहीं जानता कि दिन भर में क्या होगा। (याकू. 4:13-14)

लूका 12:17 (HINIRV) »
“तब वह अपने मन में विचार करने लगा, कि मैं क्या करूँ, क्योंकि मेरे यहाँ जगह नहीं, जहाँ अपनी उपज इत्यादि रखूँ।

उत्पत्ति 11:3 (HINIRV) »
तब वे आपस में कहने लगे, “आओ, हम ईटें बना-बनाकर भली-भाँति आग में पकाएँ।” और उन्होंने पत्थर के स्थान पर ईंट से, और मिट्टी के गारे के स्थान में चूने से काम लिया।
याकूब 4:13 पर मनन: आज या कल हम यात्रा करेंगे?
मुख्य व्याख्यात्मक बिंदु: जीवन के अस्थिर नियोजन के विरुद्ध ईमानदार निर्भरता और समय-निर्णय में परमेश्वर की इच्छा की महत्ता। याकूब बताते हैं कि लोग अपने भविष्य की योजनाएँ बनाते हैं जैसे सब कुछ उनकी मनचाही चरणबद्ध रणनीति से चलने वाला हो, जबकि सच यही है कि हमारी योजनाओं के पीछे एक असीमित प्रभु की अनुमति और नियंत्रण है। इसलिए हमें अपने प्रगट-आयोजन के साथ परमेश्वर की योजना को पहले रखना चाहिए, अन्यथा हमारा आत्म-विश्वास व्यर्थ हो जाता है।
किरदारिक साहित्यिक संदर्भ
लगभग एक छोटे से संवाद की तरह यह पंक्ति एक स्पष्ट आकांक्षा का संकेत देती है—“हम किसी नगर में जाकर एक वर्ष रहेंगे, और व्यापार से लाभ उठाएंगे।” लेखक याकूब नहीं कहता कि योजनाएँ गलत हैं, बल्कि वे चेतावनी देते हैं कि यदि योजनाएँ केवल हमारे निर्णयों पर केंद्रित हों और परमेश्वर की इच्छा को परे कर दें, तो वह ज्ञानहीनता है। यह पंक्ति संहिता की सामान्य शैली से प्रेरित है, जहाँ बहुलता में रहने वाले विश्वासियों को नयी चेतावनी दी जाती है कि समय और अवसर परमेश्वर के हाथ में हैं।
याकूब की शैली में यह एक तनावपूर्ण प्रश्न उठाती है—हम क्यों सोचते हैं कि हम अपने भविष्य के बारे में इतना निश्चित निर्णय कर सकते हैं? यह निरपेक्षित धोखे की ओर भी इशारा करता है कि जीवन अस्थायी है, और चेतावनी है कि प्रभु के द्वारा दिए गए दिन-समय का सही उपयोग ही बुद्धिमानी है।
दार्शनिक और théologique संकेत
यह वाक्य विश्वास को आत्मविश्वास से भर देता है जिसमें कहते हैं कि “हम यह कहते हैं”—इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपनी योजना बनाते समय आत्म-विश्वास के धोखे में पड़ सकता है। परमेश्वर के sovereignties के प्रकाश में, क्षण-क्षण प्रभु के हाथ में हैं और हमारी योजनाओं का वास्तविक आधार सहज रूप से उसकी इच्छा होनी चाहिए।
पवित्रशास्त्र के अन्य संदर्भों से संबंध
- प्रेरित पवित्र-वचनों में भविष्य की योजनाओं के लिए परमेश्वर की इच्छा को पहले रखने की सीख मिलती है (उदा. मूसा के समय-निर्णयों में परमेश्वर की योजना प्रमुख रहती है)।
- यह विचार अन्य स्थानों से जुड़ता है जहाँ दुनिया की वस्तुओं को संजोना, प्रेम-प्राण से तोड़ना नहीं बल्कि परमेश्वर की योजना के अनुसार चलना कहा गया है।
इन सभी संदर्भों से सीख मिलती है कि एक विश्वासी के लिए सबसे बड़ा तर्क यह है कि हम अपनी योजनाओं को परमेश्वर के निर्देश के अनुरूप बनायें, न कि उसे अपनी योजनाओं के अनुसार बनवायें।
पाठ-ग़ौर: विचारणीय प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
याकूब 4:13 हमें स्मरण कराता है कि जीवन की योजनाओं में निश्चय और प्रभु की इच्छा के बीच एक संतुलन रखना आवश्यक है। यह चेतावनी नहीं कि योजना बनाना गलत है, बल्कि यह कि हमें अपनी अहम् योजनाओं को परमेश्वर के souverain से मेल खाते हुए बनाना चाहिए और हर निर्णय में उसकी आज्ञा को प्रधान बनाना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)`
1) याकूब 4:15 — परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही बोलना और करना उचित है। यह स्पष्ट करता है कि हम अपनी योजनाओं के पीछे नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना के अनुरूप चलें।
2) प्रभु के उपदेश (यूहन्ना 15:5) — बिना मुझ के तुम कुछ भी नहीं कर सकते, यह चेतावनी एक विश्वासी के लिए है कि आत्म-निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है।
3) रोमी 12:2 — दुनिया के ढाँचे के अनुसार न ढलकर, मन-परिचालित परिवर्तन से परमेश्वर की इच्छा को सीखना है।