Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 8:1 रोमियों 8:2 रोमियों 8:3 रोमियों 8:4 रोमियों 8:5 रोमियों 8:6 रोमियों 8:7 रोमियों 8:8 रोमियों 8:9 रोमियों 8:10 रोमियों 8:11 रोमियों 8:12 रोमियों 8:13 रोमियों 8:14 रोमियों 8:15 रोमियों 8:16 रोमियों 8:17 रोमियों 8:18 रोमियों 8:19 रोमियों 8:20 रोमियों 8:21 रोमियों 8:22 रोमियों 8:23 रोमियों 8:24 रोमियों 8:25 रोमियों 8:26 रोमियों 8:27 रोमियों 8:28 रोमियों 8:29 रोमियों 8:30 रोमियों 8:31 रोमियों 8:32 रोमियों 8:33 रोमियों 8:34 रोमियों 8:35 रोमियों 8:36 रोमियों 8:37 रोमियों 8:38 रोमियों 8:39



Romans 8:3 — व्याख्या का सार
यह वचन कहता है: परमेश्वर ने वह किया जो व्यवस्था के अनुसार शरीर के कारण दुर्बल रहते हुए संभव नहीं था—अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में भेजकर, पाप के लिये बलिदान कर दिया, ताकि शरीर में पाप के दण्ड का अधिकार टूट जाए।
प्रसंगीय पृष्ठभूमि
रोमियों की परंपरा में पाप और धर्म के प्रतिशोध का संघर्ष व्याप्त है। धर्मशास्त्र के अनुसार व्यवस्था दरअसल बाहरी नियमों और पवित्रता के आचरण का मार्गदर्शन है, परन्तु तप्त-समय में वह कमजोरी दिखाती है क्योंकि यह हृदय की पलायनशीलता और आत्म-स्वार्थ के कारण असमर्थ रहती है। इस संदेश में परमेश्वर का कार्य यह है कि वह अपने पुत्र को देह के समानता में भेजकर पाप के बन्धनों का प्रभाव दूर करते हैं—देह में पाप की गिरफ्त से बहिर्गमन कर चुके प्राणी को नया जीवन दे दिया जाए।
interpretive observations
थीमैटिक सूची
अन्य उद्धरण-सम्बद्ध पाठ
इस भाग के साथ निम्न संदर्भक विचार प्रेरणा के रूप में उपयोगी हो सकते हैं:
इन सूक्तियों से दिखता है कि देह के भीतर पाप-बल से दंड देने का कार्य यीशु के जीवन और मृत्यु के माध्यम से पूरा हुआ है, ताकि विश्वासियों के लिए नया जीवन संभव हो सके।
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
1) जीवन के गंभीर संघर्षों में आशा बनी रहे कि परमेश्वर ने पाप के दण्ड का अधिकार पिता के द्वारा यीशु के माध्यम से हटाया है।
2) नैतिक जीवन में परिवर्तन के लिए बाहरी नियमों से अधिक आंतरिक आत्म-परिवर्तन की आवश्यकता है—जो पवित्र आत्मा के संचलन से संभव है।
3) भय या निराशा से नहीं, बल्कि विश्वास से जीना सीखें कि नया जीवन देह-शरीर के भीतर पवित्र कार्य कराने का माध्यम है।
एक पंक्ति निष्कर्ष
परमेश्वर ने अपने पुत्र को देह में भेजकर पाप के विरुद्ध व्यवस्था-शक्ति को पार किया, ताकि हमारे भीतर नया जीवन प्रवाहित हो और हम शुद्ध कर्मों के साथ पवित्र जीवन जी सकें।
नोट: निम्न उद्धरण सीधे लेखक-विशिष्ट टिप्पणी से प्रेरित हैं—Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सन्दर्भ।
सीधे उद्धरण: “...अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।”