Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31



अर्थ का सीधा संकेत
1 शमूएल 8:5 में लोग परमेश्वर के विरुद्ध राज्य का विचार रखते हैं और बूढ़े हो चुके शमूएल के पुत्रों के असुरक्षा नेतृत्व को देखते हुए एक मानव राजा की नियुक्ति की मांग करते हैं। वे कहते हैं कि तेरे पुत्र हमारे अधिकार में नहीं चलते, इसीलिए हमें जातियों के रीति के अनुसार एक राजा दे दे, ताकि हमारे लिये शासन हो सके।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह अध्याय इतिहास के एक निर्णायक पल को दर्शाता है: यहूदियों के लिए परमेश्वर के प्रत्यक्ष शासन के समय के अंत की चर्चा है और मानव-राज्य की मांग का आरम्भ है। शमूएल का समय, धार्मिक व्यवस्था भी चल रही थी, पर स्थानीय नेताओं की कल्पनाओं में एक केंद्रीकृत राजतंत्र की आकांक्षा बढ़ी। इस्राएल के बड़े-बूढ़े लोग जिस प्रकार एक राजा चाहते हैं, वह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का संकेत है—परन्तु परमेश्वर के कानून से यह विरोध भी है।
interpretive observations
- जनता ने राजा की मांग इसलिए की क्योंकि वे सुरक्षा और प्रशासन की स्थिरता चाहते थे; वे न केवल उठते-बैठते होकर शासक चाहते थे, बल्कि एक संस्थागत व्यवस्था चाहते थे जो युद्ध, कर व्यवस्था और न्याय के कार्यों को संभाले।
- शमूएल को यह आघात लगा कि उनका पुत्र गलत मार्ग पर हैं, और इस त्याग के कारण लोग एक अलग व्यवस्था चाहते हैं। पर परमेश्वर की दृष्टि से यह एक चेतावनी है कि मानवीय सामर्थ्य की आशा परमेश्वर के प्रत्यक्ष शासन के बजाय एक धरती के राजा पर निर्भर हो सकती है।
- यह मांग परमेश्वर के नैतिक निर्देशों के विरुद्ध भी है क्योंकि उन्हें यह बताने के लिए कि राष्ट्र के लिए राजा कैसे चुना जाए, शास्त्र में स्पष्ट आदेश है: परमेश्वर का नियम ही सर्वोपरि है।
वैचारिक सार
क्रॉस-रेफरेंसेज़ और समझ
1) प्रेषित युवाओं के समय या राष्ट्र के लिए राजा के चयन पर नीतिगत चेतावनियाँ दीखती हैं; यह अध्याय एक अनुप्रयोग है कि कुरुक्षेत्र जैसी स्थिति में परमेश्वर के मार्ग को कैसे प्राथमिकता दें।
2) प्रेरिती 13:21 जैसी अन्य कथाओं में राजा के प्रावधान और परमेश्वर के प्रतीकात्मक शासन के बीच संतुलन पर विचार मिलता है; यहाँ भी मानव-राज्य की आकांक्षा के साथ धार्मिक उत्तरदायित्व के प्रश्न उठते हैं।
3) अन्य संदर्भों में न्याय और प्रशासन के लिए संस्थागत व्यवस्था बन जाने के बाद प्रभु-स्वरूप शासन के महत्व पर विचार मिलता है।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
- परमेश्वर के बारे में प्रतिबद्धता को न छोड़ें, भले ही सामाजिक दबाव राजा की मांग के रूप में आए।
- समुदाय के सतकर्मों में एक दृढ़ नैतिकता बनाए रखें; सत्ता चाहे जो भी हो, दैवीय नियमों के अनुसार शासन स्वीकार करें।
एउंट पर्णाम और उद्धरण
यह पाठ सीधे तौर पर 1 शमूएल 8:5 से लिया गया है और उत्तरदायित्व के साथ एक नयापन दिखाता है कि कैसे लोग एक राजा चाहते हैं उसके बावजूद परमेश्वर के नियमों के अनुरूप आचरण बना रहना चाहिए।
उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से समान भावनात्मक तात्पर्य की छोटी-सी पंक्तियाँ अगर उद्धृत हों तो वे इस प्रकार संकेत करती हैं: “ईश्वर के राज्य से पृथक होकर मनुष्य के राजा की इच्छा एक मानसिक परीक्षण है”—परंतु पूर्ण उद्धरण नीचे नहीं दिया गया है, ताकि मूल पाठ की गरिमा बनी रहे।