Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31Verse
1 शमूएल 9:1 1 शमूएल 9:2 1 शमूएल 9:3 1 शमूएल 9:4 1 शमूएल 9:5 1 शमूएल 9:6 1 शमूएल 9:7 1 शमूएल 9:8 1 शमूएल 9:9 1 शमूएल 9:10 1 शमूएल 9:11 1 शमूएल 9:12 1 शमूएल 9:13 1 शमूएल 9:14 1 शमूएल 9:15 1 शमूएल 9:16 1 शमूएल 9:17 1 शमूएल 9:18 1 शमूएल 9:19 1 शमूएल 9:20 1 शमूएल 9:21 1 शमूएल 9:22 1 शमूएल 9:23 1 शमूएल 9:24 1 शमूएल 9:25 1 शमूएल 9:26 1 शमूएल 9:27



पाठ का संक्षेप दृष्टिकोण
4:11-21 के प्रसंग में शाऊल के चयन के पीछे के मानवीय आडंबर और परमेश्वर की कल्याणकारी योजना दोनों एक साथ उभरकर सामने आती है। इसVerse (1 शमूएल 9:21) में शाऊल अपनी नाक-भौंह से पूछते हैं कि क्या वे सचमुच बहुधा छोट-गोत्र और सबसे छोटे कुल से हैं, और फिर भी गोत्रात्कृष्ट बनने की बात क्यों हो रही है। यह स्थिति यह दिखाती है कि परमेश्वर कैसे असंभव-सी लगने वाली परिस्थितियों से भी कार्य कर सकता है, जब मनुष्य अपनी स्थिति को छोड़ते नहीं।
पाठ का विवरण और केंद्रीय विचार
शाऊल कहता है: मैं बिन्यामीनियों में से हूँ—सब इब्रानी गोत्रों में से सबसे छोटा गोत्र नहीं? और मेरा खतरा—यह छोटा-सा कुल नहीं? इस स्मरणीय वक्तव्य से यह संकेत मिलता है कि शाऊल अपने सामाजिक-परिवारिक अवस्थितियों पर ग़ौर करते हुए स्वयं को अयोग्य मानते हैं। परन्तु यह एक मानवीय अस्वीकृति है जो परमेश्वर के आयोजन को नहीं रोक पाती। यह उद्धार की योजना की एक टेम्पलेट बन जाती है कि परमेश्वर किस प्रकार छोटे और सामान्य को भी चुन लेता है ताकि उसकी महिमा स्पष्ट हो।
मुख्य सीख
पवित्रशास्त्रीय तुलनात्मक बातें
यहां शाऊल के आत्मविश्वास के अभाव को सामान्य किया गया है, जो कुछ अन्य पात्रों के साथ भी घटित होता है। उदाहरणार्थ, दाऊद के समय में उसे भी सीढ़ियों के नीचे नहीं, बल्कि इशारे से राजा घोषित किया गया (भिन्न संदर्भ)। साथ ही, परमेश्वर की चुनाव-प्रक्रिया में, दिसन्तर नहीं—हृदय की गहराई और परमेश्वर के उद्देश्य मुख्य होते हैं।
लागू करने योग्य अंतर-भविष्य
हम अपने आप में या अपने परिचितों में किए जाने वाले आकलनों को नीचे रखकर देख सकते हैं: क्या हम भी कभी-कभी कर्म-योग्यता के आधार पर खुद को कम आंका करते हैं? यह वाक्य हमें सचेत करता है कि परमेश्वर के उद्देश्य के सामने हमारी योग्यता-मानना मायने नहीं रखती; वह जो चुनता है वही कार्य-सारथी बनता है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप रूप में) और उनके अर्थ
-DIN: 1 समु 9:1-2 और 10:21-22 में शाऊल की पहचान से पहले गोत्र-परंपरा का चित्रण। समाधान यह कि ईश्वर का चुनाव भीतर से होता है, बाहरी दर्जे से नहीं।
-जकरिया 4:10 जैसा विचार: छोटे-छोटे कदम भी परमेश्वर की बड़ी योजनाओं के लिए आवश्यक होते हैं।
-रोमियों 9:11-12: परमेश्वर अपने उद्देश्य के अनुसार चुनाव करता है, मनुष्यों के कर्मों से नहीं।
ऐतिहासिक-धार्मिक पाठक के लिए छोटे-से निष्कर्ष
यह अनुभाग हमें बताता है कि परमेश्वर किस प्रकार असामान्य पात्रों के माध्यम से महान कार्य करता है। शाऊल की नम्रता-भरी स्थिति, और फिर भी परमेश्वर की योजना के अनुसार राजा के रूप में स्थापित होना, यह दिखाता है कि सत्ता और स्थिति परमेश्वर के साथ जुड़ी धारणा पर निर्भर नहीं करती।
छोटे, ठोस अनुप्रयोग
निष्कर्ष
1 शमूएल 9:21 में शाऊल का प्रश्न हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर की योजना मनुष्य की स्थिति नहीं, बल्कि उसकी इच्छा और विश्वास पर निर्भर करती है। यह वाक्य हमें यह दिखाता है कि ईश्वर असामान्य माध्यमों से भी अपने उद्देश्य पूरी करते हैं, और हमें अपनी स्थितियों से आगे बढ़कर उनकी महिमा को देखना चाहिए।
उद्धृत उद्धरणों की सूची: यदि उपलब्ध हों, तोMatthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के निश्चित शब्दक रहा उद्धृत हिस्से नीचे उद्धृत संस्करण के संदर्भ में ही सुरक्षित रहेंगी।