Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 शमूएल 12:1 2 शमूएल 12:2 2 शमूएल 12:3 2 शमूएल 12:4 2 शमूएल 12:5 2 शमूएल 12:6 2 शमूएल 12:7 2 शमूएल 12:8 2 शमूएल 12:9 2 शमूएल 12:10 2 शमूएल 12:11 2 शमूएल 12:12 2 शमूएल 12:13 2 शमूएल 12:14 2 शमूएल 12:15 2 शमूएल 12:16 2 शमूएल 12:17 2 शमूएल 12:18 2 शमूएल 12:19 2 शमूएल 12:20 2 शमूएल 12:21 2 शमूएल 12:22 2 शमूएल 12:23 2 शमूएल 12:24 2 शमूएल 12:25 2 शमूएल 12:26 2 शमूएल 12:27 2 शमूएल 12:28 2 शमूएल 12:29 2 शमूएल 12:30 2 शमूएल 12:31

2 शमूएल 12:21 – तत्काल पाठ का संदर्भ और अर्थ
घटना तब का मंच है जब राजा दाऊद के पुत्र अब्शलोम पर शासन के विरुद्ध विद्रोह चला और दाऊद स्वयं अपने लोगों की सुरक्षा के लिए भाग गया। युद्ध के बाद शाऊल के पुत्र डिद के साथ शोक-संवाद चलता है। इस verse में दाऊद को अति दुख के क्षण का सामना करना पड़ता है: उनका प्रशिक्षित नौकर-समूह पूछते हैं कि अनुभव क्या कह रहा था—“तूने यह क्या काम किया है? जब तक बच्चा जीवित रहा, तब तक तू उपवास करता हुआ रोता रहा; परन्तु जैसे ही बच्चा मर गया, वैसे ही तू उठकर भोजन करने लगा।”
कायदे की बात और पाठ का संदेश
यह पाठ हमें यह दिखाता है कि कैसे दाऊद की दृढ़ आस्था और संयम एक गहन परीक्षा से गुज़रती है। परमेश्वर के अभिशाप या शोक के कठिन समय में भी दाऊद ने व्यक्तिगत कष्टों को ईश्वर के साथ जोड़कर सहन किया। बेटे के मरने के तुरंत बाद भी उसका व्यवहार अंतरंग विश्वास को उजागर करता है—यह बताता है कि वास्तविक यकीन तब भी मजबूत रहता है जब परिस्थितियाँ अत्यंत विषम हों।
ईश्वर और faith पर स्पष्ट दर्पण
यह अंश यह संकेत देता है कि परमेश्वर की योजना के सामने मानव-व्यथा एक भाग बन जाती है, परंतु भक्ति और आस्था में बंधन सुरक्षित रहता है। दाऊद का आचरण यह कहता है कि जीवन के दुख के क्षणों में भी भगवान की इच्छा और प्रतिष्ठा को मानना चाहिए, और शोक में भी भरोसा खोना नहीं चाहिए।
शब्दों और चहलों की व्याख्या
- उपवास करना: दाऊद ने अपने गहरे दुःख के कारण पूजा-उपवास के माध्यम से खुद को ढाला, ताकि परमेश्वर के ऊपर विश्वास बना रहे।
- रोना बनाम भोजन: समय-सीमा के भीतर रोना और अंततः व्यवहार का सामान्य होना—यह मानव संवेदना और दिव्य नियंत्रण दोनों को दिखाता है।
समान विचार वाले पाठ और ध्यान
Related cross-references से संकेत मिलते हैं कि दुःख के समय व्यक्ति अपनी प्रार्थना और आस्था को पुनः संरचित कर सकता है—जैसे अभिशाप के बीच भी परमेश्वर के साथ गहरा संबंध बनाए रखना। ध्यान दें: यह किसी प्रकार के कठोर दबाव के रूप में नहीं, बल्कि सत्य-आस्था की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत है।
आज के लिए उपयोगी आवेदन
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त सार)
1) नीतिवचन 3:5-6 — हर प्रकार की योजना में भगवान पर विश्वास बनाये रखने की सीख।
2) रोम 8:28 — कठिनाईयों में भी परमेश्वर की समृद्ध योजना में विश्वास मजबूत करना।
3) इब्रानियों 11:1 — विश्वास का सार और देखने योग्य चीजों से अधिक देखने की दृढ़ता।
एग्रीगेट ध्यान, परिणाम
इस पाठ से स्पष्ट होता है कि दुःख के समय भी बाइबल के पात्रों की आस्था कैसे काम करती है—कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर के नियंत्रण की अनुभूति और विश्वास बनाए रखना जीवन के वास्तविक उद्देश्य का हिस्सा है।
नोट: नीचे दिए गये उद्धरण केवल Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के मौलिक टिप्पणियों से अपरिहार्य रूप से संग्रहीत स्निपेट्स के लिए हैं यदि उपलब्ध हों; पूर्ण पाठ नहीं दिए गए।