Old Testament
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2 तीमुथियुस 3:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और जैसे यन्नेस और यम्ब्रेस* ने मूसा का विरोध किया था वैसे ही ये भी सत्य का विरोध करते हैं ये तो ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है और वे विश्वास के विषय में निकम्मे हैं। (प्रेरि. 13:8)
2 तीमुथियुस 3:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 तीमुथियुस 3:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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निर्गमन 7:11 (HINIRV) »
तब फ़िरौन ने पंडितों और टोनहा करनेवालों को बुलवाया; और मिस्र के जादूगरों ने आकर अपने-अपने तंत्र-मंत्र से वैसा ही किया।

1 तीमुथियुस 6:5 (HINIRV) »
और उन मनुष्यों में व्यर्थ रगड़े-झगड़े उत्पन्न होते हैं, जिनकी बुद्धि बिगड़ गई है और वे सत्य से विहीन हो गए हैं, जो समझते हैं कि भक्ति लाभ का द्वार है।

प्रेरितों के काम 13:8 (HINIRV) »
परन्तु एलीमास जादूगर ने, (क्योंकि यही उसके नाम का अर्थ है) उनका सामना करके, हाकिम को विश्वास करने से रोकना चाहा।
मुख्य अभिध्येय बिंदु
यंत्रणापूर्ण विरोध के सत्य से सम्बंधित पथ-प्रदर्शक उदाहरण देखकर सिकंदरत्व नहीं, बल्कि सत्य की रक्षा के लिए दृढ़ता और बुद्धि की पवित्रता आवश्यक है। “यन्नेस और यम्ब्रेस” के मुकाबले जैसी निंदा समय के साथ सामने आई, वैसे ही उन लोगों का विरोध नवीनतम चलन नहीं, बल्कि सत्य के विरुद्ध एक धर्मी संघर्ष है। इस पंक्ति में पवित्र लेखन चेतावनी देता है कि जो लोग विश्वास के रास्ते पर टिके रहते हैं, वे भी विरोध का सामना करते हैं; किन्तु उनका विरोध उस पवित्रता और बुद्धि से होना चाहिए जो परमेश्वर के अनुसार है।
संदर्भ-वाचन: साहित्यिक संदर्भ
पद दो में प्रेरित पवित्र पाठ का संदर्भ है जहाँ पौलुस को चेतावनी दी जाती है कि वास्तविक विश्व में कुछ लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और वे सत्य के विरुद्ध कदम उठाते हैं। यह विचार 2 तीमुथियुस के संदर्भ में न एक क्षणिक आरोप है, बल्कि एक गहरी चेतावनी है कि विश्वासपात्रों को ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए जो दिखावे के पीछे धार्मिकता का मुखौटा लगाते हैं।
धार्मिक-वैचारिक महत्व
यह पाठ सतह पर विरोध की चर्चा करता है, परन्तु उसकी गहराई में निश्चयता और विवेक का प्रश्न है: क्या हम सत्य के साथ खड़े हैं जब तक कि तीव्र दबाव नहीं आता? «यन्नेस और यम्ब्रेस» जैसे पात्र से मसीही समुदाय सीखता है कि सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, परन्तु यह मार्ग शुद्ध विवेक और पवित्र जोड़ है। मैथ्यू हेनरी, आर्बेन्ज, और एडम क्लार्क के पारंपरिक टिप्पणी-आधारों में यह संकेत मिलता है कि सत्य के विरुद्ध उठने वाले विरोधों से बचकर सत्य को धारण करना और उसका प्रचार करना अनिवार्य है, क्योंकि यह विश्वास की औचित्य और जीवित आस्था की कसौटी है।
प्रमुख विचार एवं विश्लेषण
1) सत्य के विरोध की प्रकृति — यहाँ विरोध केवल बाहरी नहीं; भीतर का भ्रष्ट मन संकेत देता है कि वास्तव में आत्मा के भीतर एक भ्रष्ट दृष्टिकोण है जो विश्वास के उद्देश्य को नहीं पकड़ पाता।
2) बुद्धि की पवित्रता — यह न कि बुद्धि समाप्त हो जाए, बल्कि वह प्रकाशित और प्रशिक्षित हो ताकि भ्रम को समझकर सही मार्ग चुना जा सके।
3) विश्वास के विषय में निकम्मापन — आस्था का कार्य-क्षेत्र स्पष्ट है: नम्रता, धार्मिकता, प्रेम, और धैर्य के साथ जीवित आस्तिकता।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनकी संवेदना
संकेत-व्याख्या: यह क्रॉस-रेफरेंसेस संकेत देते हैं कि सत्य बनाम असत्य के संघर्ष में विश्वासी का विवेक और दृढ़ विश्वास आवश्यक है, ताकि दुष्प्रभावों से बचा जा सके और उद्धार की राह सुरक्षित रहे।
जीवंत प्रश्न (Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह उपदेश याद दिलाता है कि सत्य के साथ खड़े रहते हुए विरोध अवश्य आएगा, पर वह विरोध पवित्र विवेक, दृढ़ आस्था और प्रेमपूर्ण व्यवहार से सही दिशा में बदला जा सकता है। जो लोग सत्य के मार्ग पर टिके रहते हैं, उन्हें बाहरी और आंतरिक विपक्ष दोनों से सुरक्षित रहने के लिए निरंतर आत्म-चिन्ता, प्रार्थना और पवित्र शिक्षाओं के अनुरूप चलना चाहिए।
किसी भी पाठ के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि सत्य के विरुद्ध आवाज़ें सीमित नहीं होतीं यदि हम उसे सही तरीके से देखते और निभाते हैं।