Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकी2 तीमुथियुस 3:2 बाइबल पद की व्याख्या
2 तीमुथियुस 3:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि मनुष्य स्वार्थी, धन का लोभी, डींगमार, अभिमानी, निन्दक, माता-पिता की आज्ञा टालनेवाले, कृतघ्न, अपवित्र,
2 तीमुथियुस 3:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
2 तीमुथियुस 3:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रोमियों 1:29 (HINIRV) »
वे सब प्रकार के अधर्म, और दुष्टता, और लोभ, और बैर-भाव से भर गए; और डाह, और हत्या, और झगड़े, और छल, और ईर्ष्या से भरपूर हो गए, और चुगलखोर,

भजन संहिता 10:3 (HINIRV) »
क्योंकि दुष्ट अपनी अभिलाषा पर घमण्ड करता है, और लोभी यहोवा को त्याग देता है और उसका तिरस्कार करता है।

पद 2 तीमुथियुस 3:2 — पाठ का तत्काल संदर्भ और प्रवाह
यह पद पौलुस के दूसरे letter में उस समय की विश्वसनीय स्थिति का चित्र देता है जब वास्तविकता यह थी कि विश्वासयोग्यों के बीच चरित्र-गुणों में कमी आ रही थी। यहाँ सूचिबद्ध गुणों का संदर्भ एक चिह्न-सा है कि अंतिम दिनों में समाज कैसे ढलान पर जाएगा—स्वार्थ, लोभ और अभिमान की धारा से प्रभावित। पौलुस इस एक सूची के माध्यम से प्रेरितों को सचेत करते हैं कि परमेश्वर के अनुसार जीवन कैसे जीना है, और सांसारिक मान-प्रतिष्ठा एक अक्स-सी है जो आत्मा की परमेश्वर-निष्ठा को नहीं छूती।
क्या यह पाठ परमेश्वर या विश्वास के बारे में बताता है?
यह पद दिखाता है कि विश्वास का जीवन आन्तरिक परिवर्तन से जुड़ा है—मनुष्य की प्रकृति पूरी तरह स्व-केन्द्रित हो सकती है जब वह ईश्वर के निर्देशों को छोड़कर अपने स्वार्थपूर्ण desires को बढ़ावा देता है। निष्कर्ष यह है कि अंतिम दिनों में मानवीय प्रवृत्ति कितनी कमजोर हो जाती है जब नीतियाँ नहीं बल्कि आत्म-संतुष्टि सबसे ऊपर हो। इस अनुच्छेद में सत्य यह है कि धार्मिक आचरण केवल दिखावे तक सीमित न रहे; बल्कि प्रेम, नम्रता और माता-पिता की आज्ञाओं का सम्मान जैसे गुणों के साथ जुड़ना चाहिए ताकि विश्वास व्यवहारिक जीवन में आकार ले सके।
प्रमुख शब्दों के अर्थ
संबद्ध पाठ और संदर्भ
यह सूची तुलनात्मक रूप से अन्य सोच-विचारों से मेल खाती है कि आखिर दिनों में सामाजिक ढांचे के भीतर किस प्रकार नैतिक गिरावट दिखती है (उदा. तीतर-मीठा शब्द से परे धारणाएँ); माता-पिता की आज्ञाओं के सम्मान का भाव एक नैतिक रीढ़ बनता है। साथ ही, आंतरिक परिवर्तन के साथ बाह्य आचरण का मेल आवश्यक है—अन Sagittal cross-reference की तरह:
पूर्व-सम्पादन के लिए उद्धरण संकेत
इस पाठ पर आधारित क्लासिकल विवेचनाओं से संकलित सार यह है कि चरित्र का ढाँचा अंततः आचरण से ही पहचाना जाता है—धन, प्रतिष्ठा, आलोचना के परे जीने की प्रेरणा। नीचे के उद्धरणों में से कुछ स्पष्ट शब्द-यथार्थ रहे हैं:
Matthew Henry (Summary): “In the last days perilous times shall come; men shall be lovers of their own selves.”
Albert Barnes (Brief insight): “Selfishness destroys the relation with God and ones neighbor; love is the fulfilment of the law.”
Adam Clarke (Concise note): “The list is not exhaustive, but representative of prevailing corruptions that accompany a godless society.”
आज के समय से सीखा जाने वाला पाठ
1) आन्तरिक परिवर्तन से ही बाह्य आचरण प्रकट होते हैं—यदि हृदय से प्रेम नहीं, तो सेवा, नम्रता और आज्ञाओं का सम्मान खो जाता है।
2) परिवार-आज्ञाओं का सम्मान सामाजिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है; पिता-माता के आदेश का एहतराम एक समाजिक नैतिक ढांचे की आलोचनात्मक धुरी है।
3) ईमानदार रिश्ते—खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए भी संवेदना—एक विश्वसनीय अनुकरणीय जीवन बनाते हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
2 तीमुथियुस 3:2 एक चेतावनी है कि अंतिम दिनों में मानव-प्रकृति कितनी आसानी से विचलित हो सकती है। यह सीधे-सीधे विश्वास के प्रत्यक्ष अनुभव से जुड़ता है: जो कुछ भी व्यक्ति को ईश्वर-परक जीवन से दूर ले जाए, उसे पहचानना और पलटना अनिवार्य है।