Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकी2 तीमुथियुस 3:11 बाइबल पद की व्याख्या
2 तीमुथियुस 3:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
उत्पीड़न, और पीड़ा में मेरा साथ दिया, और ऐसे दुःखों में भी जो अन्ताकिया और इकुनियुम और लुस्त्रा में मुझ पर पड़े थे। मैंने ऐसे उत्पीड़नों को सहा, और प्रभु ने मुझे उन सबसे छुड़ाया। (भज. 34:19)
2 तीमुथियुस 3:11 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 तीमुथियुस 3:11 समानांतर पद और संबंधित वचन
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प्रेरितों के काम 14:5 (HINIRV) »
परन्तु जब अन्यजाति और यहूदी उनका अपमान और उन्हें पत्थराव करने के लिये अपने सरदारों समेत उन पर दौड़े।

भजन संहिता 34:19 (HINIRV) »
धर्मी पर बहुत सी विपत्तियाँ पड़ती तो हैं, परन्तु यहोवा उसको उन सबसे मुक्त करता है। (नीति. 24:16, 2 तीम. 3:11)

प्रेरितों के काम 13:45 (HINIRV) »
परन्तु यहूदी भीड़ को देखकर ईर्ष्या से भर गए, और निन्दा करते हुए पौलुस की बातों के विरोध में बोलने लगे।
2 तीमुथियुस 3:11 — संदर्भ और संदर्श
पद में प्रेरित पौलुस अपने प्रयोगों और दासतंत्र के अनुभवों को याद करते हैं—यानी उत्पीड़न, दर्द, और उनके साथ हुए दुःख वे कैसे भीतरी आस्था को थामे रखते हैं। यह न सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना है, बल्कि विश्वसनीय प्रेरणा का स्रोत है कि विश्वासी जीवन में विपदाएँ आती हैं, पर प्रभु ईश्वर साथ देते हैं और उद्धार करते हैं। Injunction यह है कि कहीं भी हो, परमेश्वर की सहायता और उद्धार अभी भी संभव है, जैसा कि भजन 34:19 में भी कहा गया है।
मुख्य अर्द्धार्थ और केंद्रीय संदेश
पौलुस यह बत्लाते हैं कि उन्होंने अक्खड़ असुरक्षा, तोड़फोड़, और विभिन्न शहरों के दर्दनाक अनुभव झेले—एंटाकिया, इकुनियुम, लुस्त्रा जैसे स्थानों में—तथापि परमेश्वर ने उन्हें उन परिस्थितियों से सुरक्षित रखा। संदेश सरल है: ईमानदार दृढ़ता और प्रभु पर निर्भरता से दुःख भी प्रयोजन बन जाते हैं; प्रभु का साक्षात्कार वही करता है जो विपदाओं में टिके रहते हैं।
तीन प्रमुख विषय
अनुशंसित संगत संदर्भ
- भजंसंहिता 34:19: “बहुत से धर्मी मनुष्यों के निकट दुःख रहता है, परन्तु प्रभु उन्हें सभी से छुड़ाता है।” यह verse पॉलुस के अनुभव के साथ गहरा मेल खाता है कि ईश्वर संकट के समय में भी उद्धार करते हैं।
- भागवत प्रेरितों के पाठ: विपत्तियाँ ईमानदारी की कसौटी हैं और परमेश्वर की कृपा से साहस बढ़ता है।
- रोमियों 8:28: जो प्रेम करते हैं, उनके लिए सब कुछ मिलकर अच्छे के लिए काम करते हैं; यह भी एक ऐसी पुष्टि है कि दुःख भी परमेश्वर के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हैं।
आउटलाइन: एक व्यावहारिक व्याख्या
1) पीड़ा में भी साथ: कठिनाइयों के बीच परमेश्वर का साथ होना प्रत्याशित है, न कि असंभावित।
2) उद्धार की गारंटी: प्रभु ने सभी से मुक्ति pathway प्रदान किया है—यह आत्मिक उद्धार और दैनिक सुरक्षा दोनों संदर्भों में लागू होता है।
3) धैर्य और धारण: विपत्तियों के दौरान धैर्य रखना और विश्वास को बनाए रखना ही कल्याणकारी है।
व्यावहारिक अनुपात
संक्षिप्त निष्कर्ष
2 तीमुथियुस 3:11 हमें यह याद दिलाता है कि विरोध, पीड़ा और दुख संसार की स्थायी स्थिति नहीं हैं; इनके बीच भी प्रभु साथ रहते हैं और उद्धार देते हैं। इस अनुभूति से प्रेरित होकर हमें धैर्य, उत्साह, और विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए, ताकि हमारा जीवन भी दूसरों के लिए प्रेरणा बन सके।
उद्धरण: यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke से संक्षिप्त क्लासिक विचार देखते हैं, उनसे मिलती-जुलती धारणा में कहा गया है कि विपत्तियाँ सच्चे विश्वास की पहचान कराती हैं और ईश्वर के संरक्षण का प्रमाण रहती हैं; परन्तु यहाँ अधिकतर संदर्भ परमेश्वर के उद्धार को प्राथमिक मानते हैं।