रोमियों 1:29 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

वे सब प्रकार के अधर्म, और दुष्टता, और लोभ, और बैर-भाव से भर गए; और डाह, और हत्या, और झगड़े, और छल, और ईर्ष्या से भरपूर हो गए, और चुगलखोर,

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रोमियों 1:29 पद-दर-पद बाइबल टीका

रोमियों 1:29 का सरल अर्थ

यह पद बताता है कि पापी विचार धारणाओं के परिणामस्वरूप मनुष्य कैसे अपवित्र आचरण में उतर जाते हैं—वे विभिन्न प्रकार के अधर्म, दुष्टता, लोभ, बैर-भाव, डाह, हत्या, झगड़े, छल, ईर्ष्या, और चुगलखोरी से परिपूर्ण हो जाते हैं। इस चेतावनी के आलोक में हमें यह समझना चाहिए कि पाप एक श्रृंखला है जो भीतर से बाहर तक फैलती है और सामाजिक-व्यवहार को दूषित बनाती है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

लेखक पॉल रोमियों समुदाय को स्पष्ट कर रहे हैं कि गैर-यहीश्वरीय जीवन में मानव चेतना कैसे अविवेकपूर्ण और भ्रष्ट बन जाती है, क्योंकि उन्होंने ईश्वर के तथ्य से इनकार किया और प्रकृति के अनुसार नहीं बना सके। यह पंक्ति न केवल व्यक्तिगत दोषों को उजागर करती है बल्कि एक व्यापक मानव समाज की गिरावट की भी चेतावनी है।

व्याख्या के प्रमुख बिंदु

  • अधर्म और दुष्टता: आचार-व्यवहार के कटाक्ष, निंद्य कर्म जो ईश्वर के कानून के विरुद्ध हैं।
  • लोभ और बैर-भाव: सामूहिक असुरक्षा के कारण संसर्ग और हिंसक प्रतिस्पर्धा; प्रेम की कमी।
  • डाह, हत्या, छल, ईर्ष्या, चुगलखोरी: सामाजिक सम्बन्धों को तोड़ने वाले व्यवहार; समुदाय में तनाव और भ्रांतियाँ पैदा करते हैं।

20वीं शताब्दी के उद्धरण (संक्षेप)

हेनरी, बर्न्स और क्लार्क के सार्वजनिक डोम-टिप्पणियों के सार English से Hindi में उदाहरण के रूप में नहीं दिए जा रहे हैं, पर वे इस विमर्श को सामान्य तौर पर इस प्रकार देखते हैं: पाप के इस क्रम को कभी-कभी दिल में शुरूआत मिलती है, फिर कर्म तक पहुँचता है, और अंततः समाज में विभाजन और अपराध को बढ़ाता है।

समान विचारधारात्मक संबंध (क्रॉस-रेफरेंसेज)

1) रोमियों 3:23—हम सब पाप में खरेरहित हैं, और महिमामय जीवन के लिए परमेश्वर की कृपा आवश्यक है; यह संदर्भ बताता है कि ऊपर बताए गए दोष केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सार्वभौमिक स्थिति हैं।

2) गलातियों 5:19-21—अधर्मपूर्ण फलों का स्पष्ट चित्रण; आत्मा के फल बनाम कृत्यों का तुलनात्मक विवेचन।

3) य fr 12:9-10—प्यार से प्रेरित आचरण में परिवर्तन का आह्वान; दुष्ट प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष का एक नैतिक कोड।

व्यावहारिक निष्कर्ष

हम में से प्रत्येक को यह विचार करना चाहिए कि भीतर की प्रवृत्तियाँ कैसे बाहर की जिंदगी को बनाती हैं। यदि अंतःकरण भयमुक्त, ईश्वर-आनुकूल सोच और सहायता से सजग हो, तो अधर्म के इन विभिन्न रूपों से बचना सरल हो सकता है। समाज में प्रेम, सत्य और एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

रोमियों 1:29 समानांतर पद और संबंधित वचन

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