Old Testament
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रोमियों 1:1 रोमियों 1:2 रोमियों 1:3 रोमियों 1:4 रोमियों 1:5 रोमियों 1:6 रोमियों 1:7 रोमियों 1:8 रोमियों 1:9 रोमियों 1:10 रोमियों 1:11 रोमियों 1:12 रोमियों 1:13 रोमियों 1:14 रोमियों 1:15 रोमियों 1:16 रोमियों 1:17 रोमियों 1:18 रोमियों 1:19 रोमियों 1:20 रोमियों 1:21 रोमियों 1:22 रोमियों 1:23 रोमियों 1:24 रोमियों 1:25 रोमियों 1:26 रोमियों 1:27 रोमियों 1:28 रोमियों 1:29 रोमियों 1:30 रोमियों 1:31 रोमियों 1:32



rome 1:32 का अर्थ एक नजर में
यह पद स्पष्ट करता है कि पापी लोग ईश्वर की न्याय-संवेदना से परिचित हैं, फिर भी वे न केवल वे काम करते हैं, बल्कि दूसरे लोगों के काम करने में प्रसन्न भी होते हैं। इसका संदेश यह है कि जघन्य कर्मों के प्रति उनके भीतर एक स्वीकृति, और उनके पापों पर किसी प्रकार की निष्क्रियता नहीं है।
प्रसंग-संदर्भ
रोमियों 1 अध्याय में पौलुस ने पाप की व्यापकता दिखलाई है—क्योंकि मानव ने ईश्वर के प्रकाश को भी अनदेखा किया और नीचे गिरते गए। यह पाठ उन लोगों की जिम्मेदारी को उजागर करता है जो सत्य के प्रकाश को पहचानते हैं पर उसे न मानकर दुष्कर्मों में माहिर रहते हैं। verse 32 में यह दर्शाया गया है कि ऐसे कर्मों के लिए दण्ड योग्य होने के साथ-साथ वे उन कर्मों के प्रति प्रसन्न भी रहते हैं जो इन पापों को बढ़ावा देते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
- पाप की गहराई: वे जानते हैं कि कितने बड़े पाप से दण्ड होता है, फिर भी वे उसे अपनाते हैं। यह एक जागरूक, विवेक-हINO निर्णय है, न कि अज्ञान।
- सहमति और सहचरित: “करनेवालों से प्रसन्न होना” दर्शाता है कि पापी समाज पाप को आदर्श बनाता है—यह सामूहिक अस्वीकृति नहीं बल्कि सहमात्री स्वीकृति है।
थीम-सूचि
संदर्भित पारिवारिक दृष्टि (क्रॉस-रेफरेंस)
1) रोमियों 1:18—क्योंकि निष्क्रियता नहीं बल्कि पाप की खुली अस्वीकार्यता को दर्शाता है।
2) रोमियों 2:5—ईश्वर के क्रोध के दिन के लिए पाप की कठोरता का ज्ञान।
3) रोमियों 3:20—धर्म का निष्कलंक मान पाप के बिना नहीं मिल सकता; पाप की सच्ची सजा और मर्यादा की बात।
पठन-योग्य टिप्पणी से सीख
• यह पाठ चूंकि नैतिक विवेक से परिचित होने के बावजूद पाप के साथ-साथ उसे बढ़ाने की प्रवृत्ति को भी उजागर करता है, इसलिए हर दया-प्रेरित शिक्षण के साथ संयम और विवेक की आवश्यकता है।
• समाज में पापकर्मों की स्वीकृति से बचना चाहिए; सत्य की सच्चाई को स्वीकारना ईश्वर के साथ सचेत संबंध बनाता है।
क्लियर takeaway
हम जिन चीजों को जानते हैं, उनमें से यदि पाप को न मानते हुए उसे प्रशंसा दें, तो हम दण्ड के योग्य बनते हैं; परंतु यदि हम ईश्वर के प्रकाश के पीछे चलकर पाप से दूरी बनाते हैं, तो जीवन का मार्ग साफ और सुरक्षित रहता है।
कथन-उद्धरण (public-domain से संबद्ध विचारों का समन्वय)
इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विचारों के छोटे-छोटे संकेत उद्धृत स्वरूप में सम्मिलित हैं। परन्तु इन तीनों के मूल वाक्य पूर्ण रूप से उद्धृत नहीं किये गये हैं; कड़ियों के भीतर उनके सामान्य निष्कर्षों का संक्षिप्त सम्मिश्रण किया गया है:
Matthew Henry के सन्निकट, पाप-ज्ञान और पाप-प्रवृत्ति के बारे में उनका सामान्य कथन कि लोग अपने पापों से असत्य नहीं, बल्कि सचेत रहते हैं।
Albert Barnes के अनुसार, पाप के प्रति जागरूकता के बावजूद भी उसे स्वीकारना मानव स्वभाव का भाग हो सकता है, यह एक प्रकार की नैतिक जड़ता है।
Adam Clarke का यह विचार मिलेगा कि पाप के प्रति समाज की सहमति पाप-समुदाय के नैतिक पतन को दर्शाती है।