Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 1:1 रोमियों 1:2 रोमियों 1:3 रोमियों 1:4 रोमियों 1:5 रोमियों 1:6 रोमियों 1:7 रोमियों 1:8 रोमियों 1:9 रोमियों 1:10 रोमियों 1:11 रोमियों 1:12 रोमियों 1:13 रोमियों 1:14 रोमियों 1:15 रोमियों 1:16 रोमियों 1:17 रोमियों 1:18 रोमियों 1:19 रोमियों 1:20 रोमियों 1:21 रोमियों 1:22 रोमियों 1:23 रोमियों 1:24 रोमियों 1:25 रोमियों 1:26 रोमियों 1:27 रोमियों 1:28 रोमियों 1:29 रोमियों 1:30 रोमियों 1:31 रोमियों 1:32



रोमियों 1:19 पर केन्द्रीय सार
इस पद में पवित्र कृति यह स्पष्ट करती है कि परमेश्वर के विषय का ज्ञान हर मनुष्य के भीतर प्रगट है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे अपने प्रकाश से अनुदिग्रही किया है। यह पूर्वकथन बताता है कि ईश्वरीय ज्ञान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव-स्वभाव में फिट बैठता है; यह प्राकृतिक प्रकाश द्वारा हर हस्ती तक जाता है, ताकि लोग परमेश्वर का प्रमाण पा सकें और उसका उत्तर दे सकें।
साहित्यिक संदर्भ
पद रोमियों के क्रम में लेखक प्रेरित पॉल की निष्कर्ष-पूर्वक दृष्टि को प्रस्तुत करता है कि मनुष्यों में परमेश्वर के सिद्धांत का बोध प्राकृतिक रूप से आता है। यह विचार पुराने प्रतिशनों के साथ संगति बनाता है कि परमेश्वर की महत्ता, उसकी अनुकूलता और नैतिक आदेश प्रकृति और विवेक में उद्घाटित होते हैं।
ेहु: theological significance
यह घोषणा मानवीय विवेक की समानता, और न मानवीय ज्ञान-प्राप्ति की योग्यता पर निर्भर है, बल्कि ईश्वरीय प्रकाश का द्योत है जिसे परमेश्वर ने दिया है। इससे यह सिद्ध होता है कि लोग बिना प्रत्यक्ष रिव्यू के भी ईश्वर को पहचान सकते हैं, परंतु यह मान्यता उन्हें जवाबदेह बनाती है—क्योंकि वे उस प्रकाश के अनुसार जीवन जीते या उसका विरोध करें।
चरित के साथ संबंध
बाइबिल की अन्य शाखाओं में यह विचार आता है कि प्रकृति के द्वारा ईश्वर के अस्तित्व और महत्ता का संकेत मिलता है; उदाहरण के लिए प्रकृति के ज्ञान से लोग उसकी महिमा स्वीकारते हैं (see cross-references). साथ ही, विवेक की गवाही से मनुष्य पर नैतिक दायित्व बनता है कि वे परमेश्वर के अनुसार निर्णय लें।
अनुदेश और प्रश्न
Cross-references और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
• रोमियों 10:17— विश्वास वाक्य और प्रकृति-प्रचार के बीच संबंध दिखाता है कि कैसे सुनना और सुनना-प्राप्ति信 के द्वारा लोग प्रभु पर विश्वास करते हैं।
• भजन 19:1— आकाश वरन निर्भर है; सूर्य-चन्द्र जैसे साक्षी परमेश्वर की महानता का उद्घाटन करते हैं। यह प्रकाश मनुष्यों के भीतर ईश्वर-ज्ञान का संकेत बनता है।
• प्रेरितों के काम 14:17— परमेश्वर के आशीष और प्रकृति के संकेत मानवीय विवेक को कुलाँचे में नहीं छोड़ते; वे उसकी महिमा को दिखाते हैं।
पूर्ववर्ती टिप्पणीकारों से कुछ उद्धरण (संक्षेप)
यदि उपलब्ध हो, इस अनुभाग में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के छोटे-छोटे शब्द दर्शाए जा सकते हैं; किन्तु पूर्ण पाठ नहीं है। उद्धृत वाक्यों का संकेत वहीं से लिया गया है जो सार्वजनिक-डomेन स्रोतों में संगृहीत हैं—पर यहाँ संक्षेप में उनके प्रभावी विचारों की भावना ही समाहित है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
परमेश्वर का ज्ञान मानव मन में प्रकट है और यह प्रकृति के प्रकाश से समर्थित है। यह ज्ञान उत्तरदायित्व बनाता है: लोग अपने जीवन को परमेश्वर के प्रकाश के अनुरूप ढालें; न कि उसे तुच्छ समझ कर छोड़ दें। अनुप्रयोग यह है कि विवेक के प्रति सम्मान बनाए रखें, ताकि व्यवहार-कौशल और नैतिक निर्णय परमेश्वर की महिमा के अनुरूप बनें।