Old Testament
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रोमियों 1:1 रोमियों 1:2 रोमियों 1:3 रोमियों 1:4 रोमियों 1:5 रोमियों 1:6 रोमियों 1:7 रोमियों 1:8 रोमियों 1:9 रोमियों 1:10 रोमियों 1:11 रोमियों 1:12 रोमियों 1:13 रोमियों 1:14 रोमियों 1:15 रोमियों 1:16 रोमियों 1:17 रोमियों 1:18 रोमियों 1:19 रोमियों 1:20 रोमियों 1:21 रोमियों 1:22 रोमियों 1:23 रोमियों 1:24 रोमियों 1:25 रोमियों 1:26 रोमियों 1:27 रोमियों 1:28 रोमियों 1:29 रोमियों 1:30 रोमियों 1:31 रोमियों 1:32



रोमियों 1:31 का तात्पर्य और धर्मार्थ संदेश
इस वचन को पढ़ते समय पाठक एक ऐसी गिरावट की तस्वीर देखता है जिसमें मानव हृदय परमेश्वर के निर्देशों से दूर होकर निर्बुद्धि, विश्वासघाती, प्रेम और दया के अभाव में पड़ जाता है। रोमियों 1 के संदर्भ में यह वचन विशेषकर उन लोगों के आचार-व्यवहार को दर्शाता है जिन्होंने ईश्वर की ईमानदारी और नैतिक कानून को नकार दिया है। यहाँ प्रमुख मूल्य यह है कि पवित्र आत्मा का प्रभाव जब दूर हो जाता है, तब मनुष्यों में नैतिक विज्ञान घटते जाते हैं और जीवन में जड़ता, चुहल, पक्षपात और निर्दयता आ जाती है। HINIRV अनुवाद इस तथ्य को संकुचित नहीं छोड़ता, बल्कि दिल that की स्थिति को स्पष्ट रूप से दिखाता है: निर्बुद्धि, विश्वासघाती, प्रेम और दया का आभाव और निर्दयी हो गए।
पाठ के अध्याय में इस वचन की भूमिका
रोमियों 1:31 बुरा आचरण दिखाते ऐसे लोगों की पहचान देता है जिनके भीतर का सप्तक-आचरण सो गया है—परमेश्वर के ज्ञान और विवेक से कटे हुए। अध्याय के बहु-आयामी संदर्भ में यह निष्कर्ष उस गिरती संस्कृति की तस्वीर है जो ईश्वर को मानने के स्थान पर अपनी प्रकृतियों के अनुसार जीवन जीने की ठान लेती है। इस पंक्ति में दिखती है कि मानवीय व्यवहार में नैतिकता तब नष्ट होती है जब हृदय सत्य से दूर रह जाता है और प्रेम, दया के बजाय आत्म-स्वार्थ उभर आता है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
अन्य बाइबल पाठों के साथ तुलना
• स्तोत्र 14:1–3 और योहन् 3:19–21 जैसी जगहों पर मानव की विवेकहीनता और अंधकार के परिणाम प्रकट होते हैं; यह दिखाता है कि दया और सत्यमार्ग की कमी कैसे लोगों को पतन की ओर ले जाती है।
• 1 कुरिन्थी 13:2-3 में प्रेम की कमी होने पर सब ज्ञान, विश्वास और महान कार्य भी प्रभावहीन हो जाते हैं; यह स्पष्ट करता है कि प्रेम वास्तविक ऊँचाई है जो नैतिकता के ऊपर है।
• युवानों के लिए मार्गदर्शक शिक्षा में प्रसिद्ध गलातियों 5:22-23 के फलों के साथ यह verse मिलकर बताता है कि आत्मिक फल कैसे व्यक्त होते हैं जब जीवन में दिव्य प्रभाव नहीं रहता।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
- आत्म-आत्म-समर्पण से ईश्वर के साथ नियमित संवाद बनाए रखें ताकि विवेक जागृत रहे।
- दूसरे के प्रति प्रेम और दया बनाए रखना, खासकर कठिन समय में।
- समाज में भ्रष्टाचार या कठोरता के प्रति सजग रहें और नैतिकता को केवल निजी नहीं, सामुदायिक जीवन में भी लागू करें।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) रोमियों 1:28–32 — विवेक के अभाव में गिरावट की विस्तृत तस्वीर; यह स्पष्ट करता है कि गैर-रूढ़ विश्वास में क्या प्रभाव हो सकता है।
2) 1 तीमुथियुस 4:12 — स्वतन्त्रता में नैतिक आचरण बनाए रखने की प्रेरणा; युवाओं के लिए नमूना।
3) योआश 59:14–15 — न्याय के अभाव और असमानता के कारण सामाजिक ढाँचा ढहना।
सारांश
रोमियों 1:31 एक सच्चे चेतावनी-चिह्न के रूप में सामने आता है कि विवेक, प्रेम और दया के अभाव से मनुष्य कब कितना गिर सकता है। परन्तु यह भी संकेत देता है कि बपतिस्मा और पवित्र आत्मा की कृपा से ही जीवन का नैतिक उन्नयन संभव है। सही जीवन वही है जिसमें ईश्वर के नियमों के अनुरूप प्रेम, विश्वास और दया के कर्म आगे आएँ।
नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पूर्ववर्ती विचारों से आवश्यकतापूर्ण उद्धरण संक्षेप रूप में शामिल कर केवल आवश्यक स्थानों पर संकेत किया गया है।