रोमियों 1:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इस कारण कि परमेश्‍वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्‍वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उनका निर्बुद्धि मन अंधेरा हो गया।

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रोमियों 1:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

रोमियों 1:21 का संदर्भ और उसका अर्थ

पाप के रास्ते में मानव का प्रतिरोध तब सामने आता है जब परमेश्वर को जानने के बीच भी वह उसकी महिमा, धन्यवाद और उपकार के प्रति कृतज्ञ नहीं होता। रोमियों 1:21 में प्रेरित पौलुस इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं: परमेश्वर को जानने के बावजूद वे बुद्धिमत्ता से परे होकर व्यर्थ विचार करने लगे और उनके मन अंधकार में डूब गए। इसका पृष्ठभूमि यह है कि मूर्तिपूजा और創तिक अलंकरणों के बीच इंसान परमेश्वर की सच्ची महिमा को छोड़ कर अपनी कल्पनाओं में रम गया।

मुख्य विचार

इस वचन में तीन प्रमुख बातें निकल कर आती हैं:

  • जानना और मानना—’परमेश्वर को जानना’ के बावजूद उनकी प्रतिक्रिया भिन्न थी; ज्ञान के साथ कृतज्ञता नहीं थी, बल्कि मनो या विचारों ने गलत दिशा पकड़ी।
  • व्यर्थ विचार—यही व्यर्थता उनके चिंतन के पंछी बन गई। वे समझ में नहीं आने वाले तर्कों और निंदित विचारों में फँस गए, जो अंततः आध्यात्मिक अंधेरे को जन्म देता है।
  • आध्यात्मिक अंधकार—हृदय की इस अंधकारग्रस्तता ने व्यवहार और नैतिक विवेक को बाधित किया, जिससे परमेश्वर से दूर हटना सहज बन गया।

दो-तीन प्रमुख विषय

1) मानवीय जवाबदेही बनाम ज्ञान का दमन: वह जो जानता है, उसे छोड़कर भी वे क्यों नहीं मानते? यह दिखाता है कि आध्यात्मिक चेतना हमारे निर्णय-स्वतंत्रता पर निर्भर है।

2) विचारों की प्रकृति: विचारों का स्वरूप व्यवसाय-शास्त्र जैसा नहीं, बल्कि अस्तित्व के उद्देश्य से जुड़ा होता है। व्यर्थ विचारों का परिणाम है अंर्त-नीति में दूरी, जो प्रेरित परमेश्वर के साथ रिश्ते में कटौती करता है।

3) हृदय की स्थिति: केवल ज्ञान नहीं, बल्कि कृतज्ञता और परमेश्वर के महिमा की मान्यता होना आवश्यक है; बिना इन उपहारों के ज्ञान भी निष्क्रिय हो सकता है।

संबद्ध पदों के संदर्भ

हालातर अन्य प्रकरण जो इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं:

  • यहोशू 24:15—“मैं और मेरे घराने भगवान यहोवा की सेवा करिएगे”; यह स्मरण कराता है कि ज्ञान के साथ प्रतिक्रिया निष्ठा और कृतज्ञता से जुड़ी है।
  • 1 कुरिन्थियों 2:14—“मनुष्य की सोच परमेश्वर के तर्कों को नहीं समझती”; यह दिखाता है कि आत्मिक दृष्टी का अभाव कैसे व्यर्थ विचारों को जन्म देता है।

व्यावहारिक चिंतन

हम किस प्रकार अपने जीवन में परमेश्वर की महत्ता को पहचानते हैं, इसका परीक्षण करें: क्या हमारी दिनचर्या में कृतज्ञता भरा ध्वनि है, क्या हम कठिन प्रश्नों में भी परमेश्वर के नाम को स्थिर रखते हैं, और क्या हमारी वैचारिक धारा यह संकेत देती है कि हम प्रभु के प्रकाश की ओर रुचि रखते हैं? यदि नहीं, तो आत्म-निरीक्षण आवश्यक है—क्यों कि ज्ञान बिना कृतज्ञता अंधकार में डाल सकता है।

संक्षिप्त सार

रोमियों 1:21 यह स्मरण कराता है कि ज्ञान और सचेतनता के साथ भी यदि हम परमेश्वर की महिमा के प्रति कृतज्ञ न हों, तो हमारा मन व्यर्थ विचारों में डूब सकता है और आत्मिक अंधकार बढ़ सकता है। सही उत्तर यह है कि हम जानने के साथ धन्यवाद और परमेश्वर की महिमा के लिए जीवन बिताएं, ताकि सचेत निष्ठा और विवेकของ प्रभु के प्रकाश में चलना संभव हो सके।

अनुवाद टिप्पणी (संक्षेप)

पौलुस का यह आह्वान यह दर्शाता है कि ज्ञान और विवेक के साथ कृतज्ञता का अभाव व्यक्ति को सही दिशा से भटका सकता है। संत Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के प्रायः उद्धृत कथन इस अनुभूति के साथ संगत हैं: वे कहते हैं कि परमेश्वर से अज्ञानता नहीं, बल्कि मन की ठहरावट और आत्म-स्वार्थ इस अंधकार का कारण बनती है। इस संवाद में एक साथ एकीकृत निष्कर्ष यह है कि ईमानदारी से परमेश्वर को जानना और उसकी महिमा में जीवन समर्पित करना ही हर व्यत्यय को दूर करने का मार्ग है.

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

रोमियों 1:21 समानांतर पद और संबंधित वचन

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