Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 1:1 रोमियों 1:2 रोमियों 1:3 रोमियों 1:4 रोमियों 1:5 रोमियों 1:6 रोमियों 1:7 रोमियों 1:8 रोमियों 1:9 रोमियों 1:10 रोमियों 1:11 रोमियों 1:12 रोमियों 1:13 रोमियों 1:14 रोमियों 1:15 रोमियों 1:16 रोमियों 1:17 रोमियों 1:18 रोमियों 1:19 रोमियों 1:20 रोमियों 1:21 रोमियों 1:22 रोमियों 1:23 रोमियों 1:24 रोमियों 1:25 रोमियों 1:26 रोमियों 1:27 रोमियों 1:28 रोमियों 1:29 रोमियों 1:30 रोमियों 1:31 रोमियों 1:32



रोमियों 1:28 परिप्रेक्ष्य में: परमेश्वर ने उन्हें उनके निकम्मे मन पर छोड़ दिया
मुख्य interpretive point: जिस क्षण मानव ने परमेश्वर को पहचानने से इनकार कर दिया, वह परमेश्वर ने उनके मन को निकम्मे, अंधे और असंतुष्ट बनने दे दिया; यह निष्क्रिय निष्कासन नहीं, बल्कि परिणामस्वरूप एक आत्मिक अवरोध की स्थिति है, जो उनके कर्मों और विचारों में असंसार्यता पैदा कर देती है। यह पंक्ति एक दुष्परिणाम को दर्शाती है कि पाप के choix ने परमेश्वर के प्रकाश से मानव को दूर कर दिया है, और परिणामस्वरूप वे तर्कहीन, असंगत और अवमानजनक कर्म करते हैं।
साहित्यिक संदर्भ (Literary context)
रोमियों 1 में पौलुस कैंसरल स्थितियों में मानव की धर्म-प्रेरणा का पतन दिखाते हैं: विश्व के भीतर फर्क नहीं होने के बावजूद बहुधा लोग प्रकृति से परमेश्वर के संकेतों को नहीं मानते। 28वाँ पद उसी क्रम को मजबूत करता है—जैसे-जैसे मानव ने सच को नहीं माना, परमेश्वर ने उन्हें मन के भीतर की बुराइयों के अनुरूप छोड़ दिया। यह निष्कर्षोन्मुखी क्रम है: मानवीय स्व-चयन (अपना विचार) → परमेश्वर की रोक-थाम का हटा दिया जाना → खुला अवज्ञा और असंतुष्टि के कर्म।
तेहनीकी महत्व (Theological significance)
यहां “निकम्मे मन” से आशय मन के तर्क या नैतिक विवेक की विकलांगता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्पर्श और प्रेरणा से वंचित होना है। यह परमेश्वर के प्रकाश से दूर करने का परिणाम है—न कि सिर्फ एक नैतिक गलती। यह स्थिति कभी-कभी “स्वों को छोड़ना” की चेतावनी देता है कि जब दैवीय प्रकाश को ठुकरा दिया जाए, तो व्यक्ति अपनी शक्तियों से भी मुक्त नहीं हो पाता।
क्रॉस-रेफरेंसेस (Cross-references) और उनके संकेत
उच्चारण स्पष्ट करें: इस पाठ में परमेश्वर की नियंत्रण-योजना और मानव की स्व-चयन-आकृति के बीच संघर्ष दिखता है; नहीं कि परमेश्वर खुद उन्हें मजबूर कर रहा है, बल्कि उन्होंने अपनी पहचान-अनुभूति को रोक दिया है।
चिन्तन के प्रश्न (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
रोमियों 1:28 एक चेतावनी है कि जब मानव अपने प्राकृत ज्ञान और परमेश्वर के प्रकाश को ठुकराता है, तो वह अपने मन को स्व-निर्मित अंधकार में चला देता है। यह स्थिति पाप और असंतुष्टि के प्रति एक चिरस्थायी मार्ग बनाती है। परन्तु यह संकेत भी देता है कि प्रभु प्रकाश और जीवन की धारा को फिर से खोल सकते हैं, यदि हम संकल्पपूर्वक लौटें और परमेश्वर के प्रकाश को अपनाएं।
"जब उन्होंने परमेश्वर को पहचानना न चाहा"—यह वाक्यांश Romans 1:28 के मूल क्रम की विशिष्ट व्याख्या के साथ मेल खाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आत्मिक जागृति के अभाव में मनुष्य अपने आप ही अंधकार की ओर बढ़ता है।
नोट: नीचे उद्धृत पुराने टिप्पणीकारों से मिलते-जुलते विचारों के सार, ताकि पाठक को गहराई मिले, बिना पूर्ण टेक्स्ट उद्धरण के:
Matthew Henry की निष्कर्ष-रेखा: प्रशासनिक विवेक के क्षय के साथ, जीवन के स्वरूप में नैतिक विफलता के संकेत दिखते हैं; यह दर्शाता है कि परमेश्वर के प्रकाश को ठुकराने से परिणामस्वरूप अंधकार बढ़ता है।
Albert Barnes की सामाजिक-धर्मशास्त्रीय दृष्टि: देवता के प्रकाश के रास्ते से हटना न केवल व्यक्तिगत पाप है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक गिरावट का कारण बन सकता है, क्योंकि यह तर्कों के विवेक को निर्जी affidant बना देता है।
Adam Clarke की व्याख्या: प्रकृति के मार्ग से विमुख होने पर मानव अपने विकृत विवेक के साथ कार्य करता है; यह पथ पर गिरे लोग अपने क्षमायोधा जीवन से भी दूर हो जाते हैं।